
इस दुनिया में हम यदि पैदा हुए हैं तो हमें विभिन्न प्रकार की समस्याओं का सामना करना ही पड़ेगा। कबीर साहब ने कहा है — 'देह धरे का दण्ड है'। तो जीवन में समस्याएँ तो होंगी ही, पर यह हमारा कर्तव्य है कि हम अपनी समस्याओं और दुःखों को पहचानें और उनका निवारण करें।
सबकी परेशानियाँ अलग-अलग हो सकती हैं पर सबकी परेशानियों की जड़ एक ही है। तो समाधान भी जड़ से ही करना होगा। इसके लिए मेहनत लगती है, साधना लगती है, जीवन की गलत धारणाओं, गलत पहचानों और गलत रिश्तों को जानना होता है, और फ़िर उन पर निर्ममता से प्रहार करने की आवश्यकता होती है।
वह मूल समस्या क्या है? और उस मूल समस्या का समाधान क्या है? इन्हीं प्रश्नों के उत्तर के लिए आचार्य जी का नया कोर्स 'व्यक्तिगत परेशानियों का अचूक हल' तैयार किया गया है। अपने मन को जटिलताओं से मुक्त और जीवन को आनन्दमय बनाने के लिए इस कोर्स का हिस्सा ज़रूर बनें।
यह कोर्स श्वेताश्वेतर उपनिषद् के अध्याय 6 के कुछ श्लोकों पर आधारित है। साथ ही उन श्लोकों से जुड़े प्रश्नों पर भी खुलकर चर्चा की गयी है।
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श्वेताश्वतर उपनिषद् का स्थान ईशादि दस प्रधान उपनिषदों में है। इसके वक्ता श्वेताश्वतर ऋषि हैं। इस उपनिषद् की विवेचनशैली बड़ी ही सुसम्बद्ध और भावपूर्ण है। यह उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत है। इसमें कुल छ: अध्याय हैं।
यह पाठ्यक्रम अध्याय 6 के छठे और सातवें श्लोक पर आधारित है। अध्याय 1 में जगत् कारण का निर्णय कर प्रण व चिन्तन पूर्वक ध्यानाभ्यास को ही उसके साक्षात्कार का साधन बताया गया है। इसका विशेष विवरण अध्याय 2 में है। अध्याय 2 में ध्यान की विधि व ध्यान के योग्य स्थान, यौगिक क्रियाओं का वर्णन व आत्म साक्षात्कार से सम्बंधित प्रश्नों पर प्रकाश डाला गया है। अध्याय 3 में एक सफल जीवन व उसकी उच्चतम संभावना व अध्याय 4 में मन की स्थिरता पर चर्चा की गयी है। अध्याय 5 में आंतरिक स्पष्टता के ऊपर ज़ोर दिया गया है। अध्याय 6 में दुनिया से सही सम्बंध क्या है, इस पर चर्चा की गयी है।
आचार्य प्रशांत की इस स्पष्ट व सरल व्याख्या से व्यक्तिगत परेशानियों का अचूक हल पता चलता है।