
आत्मा पदार्थ नहीं है, उसका साक्षात्कार कैसे कर लोगे? साक्षात्कार फिर किसका करना होता है? साक्षात्कार करना होता है माया का, मन का। आत्म-साक्षात्कार का मतलब यह नहीं होता कि तुम अपने भीतर देखोगे और जगमग-जगमग आत्मा को पाओगे। आत्म-साक्षात्कार का मतलब होता है अपने विकृत और कुत्सित रूप को देखना, अपनी वृत्तियों को देखना, अपने आंतरिक छल-कपट को देखना।
समझें आत्म साक्षात्कार का वास्तविक अर्थ आचार्य प्रशांत के साथ इस अनूठी प्रवचनमाला में। यह प्रवचनमाला श्वेताश्वतर उपनिषद् के अध्याय 2 पर आधारित है।
श्वेताश्वतर उपनिषद् का स्थान ईशादि दस प्रधान उपनिषदों में है। इसके वक्ता श्वेताश्वतर ऋषि हैं। इस उपनिषद् की विवेचनशैली बड़ी ही सुसम्बद्ध और भावपूर्ण है। यह उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत है। इसमें कुल छ: अध्याय हैं।
यह पाठ्यक्रम अध्याय 2 के चौदहवे श्लोक से सत्रहवे श्लोक पर आधारित है। अध्याय 1 में जगत कारण का निर्णय कर प्रण व चिन्तन पूर्वक ध्यानाभ्यास को ही उसके साक्षात्कार का साधन बताया गया है। इसका विशेष विवरण अध्याय 2 में है। अध्याय 2 में ध्यान की विधि व ध्यान के योग्य स्थान, यौगिक क्रियाओं का वर्णन व आत्म साक्षात्कार से सम्बंधित प्रश्नों पर प्रकाश डाला गया है।
आचार्य प्रशांत की इस स्पष्ट व सरल व्याख्या से आत्म साक्षात्कार का वास्तविक अर्थ पता चलता है।
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