
जीवन में लगातार कोशिश यही रहती है कि कहीं असफल ना कहलाएँ। कभी इस मापदंड पर तो कभी उस मापदंड पर मन खुद को तोलता ही रहता है: ऐसी गाड़ी, वैसा बंगला होगा तो सफल होगी ज़िन्दगी!
और ऐसा नहीं हुआ तो? खुद को असफल मान बैठते हैं हम। असफलता का भाव मन को कुंठित कर देता है। मन जितना खुद को छोटा समझता रहता है उतना ही वह बड़ी आकर्षक वस्तुओं से खुद को जोड़ना चाहता है।
"बड़ी गाड़ी होगी तो मैं भी बड़ा हो जाऊँगा"
"बड़ा बंगला होगा तो मैं भी बड़ा कहलाऊँगा"
वास्तव में क्या है सफलता?
जीवन की उच्चतम संभावना क्या है?
जानते हैं वेदों के ऋषियों से!
यह कोर्स उन सभी के लिए है जो जीवन में सफलता खोज रहे हैं और उस हर एक चीज़ से खुद को जोड़ना चाहते हैं जो उनको बड़ा बना दे।
समझें सफलता के वैदिक सूत्र आचार्य प्रशांत के साथ श्वेताश्वतर उपनिषद् के तृतीय अध्याय पर आधारित इस सरल वीडियो कोर्स में।
श्वेताश्वतर उपनिषद् का स्थान ईशादि दस प्रधान उपनिषदों में है। इसके वक्ता श्वेताश्वतर ऋषि हैं। इस उपनिषद् की विवेचनशैली बड़ी ही सुसम्बद्ध और भावपूर्ण है। यह उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत है। इसमें कुल छ: अध्याय हैं।
यह पाठ्यक्रम अध्याय 3 के नौवे व दसवे श्लोक पर आधारित है। अध्याय 1 में जगत् कारण का निर्णय कर प्रण व चिन्तन पूर्वक ध्यानाभ्यास को ही उसके साक्षात्कार का साधन बताया गया है। इसका विशेष विवरण अध्याय 2 में है। अध्याय 2 में ध्यान की विधि व ध्यान के योग्य स्थान, यौगिक क्रियाओं का वर्णन व आत्म साक्षात्कार से सम्बंधित प्रश्नों पर प्रकाश डाला गया है। अध्याय 3 में एक सफल जीवन व उसकी उच्चतम संभावना पर चर्चा की गयी है।
आचार्य प्रशांत की इस स्पष्ट व सरल व्याख्या से सफलता के वैदिक सूत्रों का पता चलता है।
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