
स्थिरता की उम्मीद हम अक्सर ही दुनिया से करते हैं। यह जानते हुए भी कि यहाँ कुछ स्थिर नहीं है।
"मेरे रिश्ते हमेशा वैसे ही बने रहें जैसे पहले थे।"
"मेरी छवि लोगों के मन में अच्छी बनी रहे।"
"लोग मुझसे वैसा ही व्यवहार करें जैसा करते थे।"
पर जीवन हमारी उम्मीदों के हिसाब से नहीं गति करता। परिस्थियाँ लगातार बदलती रहती हैं और अक्सर ही उन परिस्थितियों के सामने हम खुद को कमज़ोर पाते हैं।
इस कमज़ोरी का मूल कारण क्या है? एक विचलित मन।
जब हम भीतर से स्थिर नहीं होते हैं तो परिस्थितियों के गुलाम बन जाते हैं।
यह कोर्स उन सभी के लिए है जो एक स्थिर चित्त के साथ जीवन का आनंद लेना चाहते हैं।
आचार्य प्रशांत का यह सरल कोर्स "मन में स्थिरता कैसे लाएँ?" श्वेताश्वेतर उपनिषद् के अध्याय 3 और 4 के कुछ श्लोकों पर आधारित है।
श्वेताश्वतर उपनिषद् का स्थान ईशादि दस प्रधान उपनिषदों में है। इसके वक्ता श्वेताश्वतर ऋषि हैं। इस उपनिषद् की विवेचनशैली बड़ी ही सुसम्बद्ध और भावपूर्ण है। यह उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत है। इसमें कुल छ: अध्याय हैं।
यह पाठ्यक्रम अध्याय 3 के इक्कीसवें श्लोक और अध्याय 4 के पहले से सातवें श्लोक पर आधारित है। अध्याय 1 में जगत् कारण का निर्णय कर प्रण व चिन्तन पूर्वक ध्यानाभ्यास को ही उसके साक्षात्कार का साधन बताया गया है। इसका विशेष विवरण अध्याय 2 में है। अध्याय 2 में ध्यान की विधि व ध्यान के योग्य स्थान, यौगिक क्रियाओं का वर्णन व आत्म साक्षात्कार से सम्बंधित प्रश्नों पर प्रकाश डाला गया है। अध्याय 3 में एक सफल जीवन व उसकी उच्चतम संभावना व अध्याय 4 में मन की स्थिरता पर चर्चा की गयी है।
आचार्य प्रशांत की इस स्पष्ट व सरल व्याख्या से मन में स्थिरता लाने के उपाय पता चलते है।
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