श्रोता : सर, अभी आपने बात की थी कि आलस बिल्कुल नहीं होना चाहिए| तो उस पर थोड़ा और बता देंगे कि आलस को अहंकार किस तरह से इस्तेमाल करता है?
वक्ता : आलस बड़ी चालाक चीज़ होती है | कोई भी फ़िज़ूल काम करने में तुम्हें कभी आलस नहीं आयेगा | तुमने कभी गौर किया है कि तुम्हें आलस किन कामों में, किन चीजों में आता है? आलस ऐसा नहीं है कि अँधा है | खूब आँखें हैं उसके पास, बड़ा शातिर है | खूब चुन-चुन के आता है आलस | कभी देखा है तुम्हें आलस किन-किन चीजों में आता है? आलसी-वालसी नहीं हो तुम | तुम बड़े परिश्रमी हो | जहाँ पर तुम्हारे स्वार्थ सिद्ध हो रहे होते हैं, वहाँ तुम्हें कभी आलस नहीं आयेगा | खूब दौड़ लगा लोगे | अभी अष्टावक्र गीता की बात कर रहे थे | अष्टावक्र तो कहते हैं कि “जो ज्ञानी होता है, वो परम आलसी हो जाता है|” उससे उनका यही अर्थ है | वो कहते हैं कि वो अजगर समान आलसी हो जाता है | आलसी से अर्थ है कि उसका कोई स्वार्थ नहीं रहता | उसके पास कोई मोटिवेशन (प्रेरणा) नहीं है भागने के लिए | तुम्हारे पास तो खूब हैं | तुम्हें आलस सिर्फ़ वहाँ आता है, जहाँ तुम्हारे पास कोई स्वार्थ नहीं है| वहाँ आलस आ जायेगा | जहाँ तुम्हारे स्वार्थ बँधे हों, वहाँ कैसा आलस? कहीं रुपया-पैसा फँस रहा हो, देखो कैसे कुलाँचे मारते हो | हिरन, खरगोश सब पीछे छूट जायें, तुम ऐसी चौकड़ी मारते हो |
(सभी हँसते हैं)
और जहाँ ये हो कि “अरे, कुछ लिखना है | इसके कुछ पैसे तो मिलते नहीं | कोई दाम तो मिलते नहीं|” तो वहाँ देखो कैसे लिखते हो | तो फ़िर भूल जाते हो, “आलस आ गया|” तुम्हें आलस न आये इसलिए वहाँ पर भी दाम बाँधने पड़ते हैं | फ़िर नहीं आता | ये सब मन की वृत्तियाँ हैं | तुम्हारा आलस अगर समदृष्टि वाला होता कि “मालिक ऐसे आलसी हैं कि हिलते ही नहीं| कि बगल में 500 का नोट भी पड़ा हो तो देखेंगे ही नहीं, कहेंगे कि, “कौन उठाये|” तो तुम्हारा आलस बड़ा शुभ आलस होता, पर वैसा है नहीं| कभी मत कहना कि आलसी हो | आलसी-वालसी नहीं हो |

