अन्धः तमः प्रविशन्ति ये विद्यामुपासते
ततो भूयः इव ते तमो य उ विद्यां रताः
ईशोपनिषद
आचार्य प्रशांत: ईशावास्य है, ईशावास्य उपनिषद का बहुत प्रसिद्ध मंत्र है|
अन्धः तमः प्रविशन्ति ये विद्यामुपासते
ततो भूयः इव ते तमो य उ विद्यां रताः
~ ईशोपनिषद
जो अविद्या कि उपासना करते हैं, वो गहरे अहंकार में प्रवेश करते हैं| ” ततो भूयः इव ते तमो य उ विद्यां रताः ” और उससे भी गहरे अंधकार में वो प्रवेश करते हैं, जो विद्या में ही रत रहते हैं| तो पूछा कि क्या अर्थ है? (प्रश्न पढ़ते हुए)
जैसी हमारे मन में छवि है उपनिषदों की, धर्म की, आध्यात्मिकता की, तो हमें ज़रा भी अचरज नहीं होगा मंत्र की पहली पंक्ति से| क्योंकि क्या कहती है पहली पंक्ति? जो अविद्या में रत रहते हैं, वे गहरे अंधेरे में प्रवेश कर जाते हैं| ये बात हमें वेदों की और उपनिषदों की अपनी मानसिक छवि के अनुकूल ही लगती है, कि बात बिल्कुल ठीक कही| अविद्या माने? विषयगत अनुभव, जो कुछ भी इन्द्रियों से प्रतीत होता है| मन जिसका अनुभव कर सकता है, वो सब ‘अविद्या’|

