आचार्य प्रशांत: ईगो (अहंकार) का सांकेतिक, शाब्दिक, आध्यात्मिक सब एक ही अर्थ होता है – ‘मैं’। ‘मैं’ की भावना को अहम्, ईगो कहते हैं।
प्रश्नकर्ता: तो क्या स्वयं को किसी भी पहचान से परिभाषित करना ही अहम् है?
आचार्य: अपनी हस्ती को अनुभव करना, यही ईगो है। ‘मैं हूँ', इसको अनुभव करना अहम् है।
प्र: पर अहम् से आगे जाने की बात भी तो स्वयं अहम् ही कर रहा है न!
आचार्य: ख़ुद अहम् कर रहा है क्योंकि ख़ुद से परेशान है। तुम ख़ुद से परेशान नहीं हो?
प्र: निश्चित रूप से हूँ।
आचार्य: बस। आत्मा को कोई परेशानी नहीं है, आत्मा को कुछ हासिल नहीं करना है। ना आगे जाना है, ना पीछे जाना है। सारी दिक़्क़तें किसके लिए हैं? अहम् के लिए हैं। और सारी दिक़्क़तें उसे किससे हैं? आत्मा तो किसी को दिक़्क़त देती नहीं। अहम् को ही दिक़्क़त है, और अहम् को अहम् से ही दिक़्क़त है।


