अपने ही विरुद्ध रण है गीता || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)

आचार्य प्रशांत: पहले ही अध्याय में, अच्छे से देखिए, दो हैं जो परेशान हैं। कौन? रणक्षेत्र में दो हैं जिनकी चिंता पहले ही अध्याय में हमारे सामने आ जाती है — दुर्योधन और अर्जुन।
इस बात को अच्छे से पकड़िए। चिन्ताग्रस्त होना बुरा नहीं है; दुर्योधन वाली चिंता रखना बुरा है। और कृष्ण के साथ रहने से ऐसा नहीं कि आप चिन्ताहीन हो जाएँगे; हाँ, आपकी चिंता का स्तर उठ जाएगा। आपकी चिंता ही फिर आपको कृष्ण के पास ले आएगी। दुर्योधन भी चिंतित है और उसकी चिंता उसे कृष्ण से और दूर धकेलती है। अर्जुन भी चिंतित है लेकिन अर्जुन की चिंता कृष्ण के और पास लाती है।
भूल जाइए अध्यात्म की उस छवि को जो कहती है कि आध्यात्मिक आदमी तो द्वंदों के बिलकुल पार निकल जाता है, और निर्द्वंद और निर्विचार होकर आनंद के सुखसागर में गोते लगाता है। द्वंद तो लगातार रहेगा; वो द्वंद किसके पक्ष में कर रहे हो, बस ये देख लो। अर्जुन आपको निर्द्वंद दिख रहे हैं क्या? अर्जुन का द्वंद तो दुर्योधन के द्वंद से भयानक है ज़्यादा। दुर्योधन के बारे में तो बस यही कहा गया है कि शंखनाद सुनकर के दिल दहल गया और अर्जुन तो अपने मुँह से स्वीकार रहे हैं कि ‘टाँग काँप रही है और बदन जल रहा है, रोएँ खड़े हो रहे हैं, सारी ताक़त जैसे गिर गयी, ये धनुष नहीं संभाला जा रहा’। और ये उस व्यक्ति की हालत है जो कृष्ण के साथ है। तो कृष्ण के साथ होने का अर्थ समझिए।
कृष्ण के साथ होने का अर्थ ये नहीं होता कि आपको जीवन युद्ध में निश्चित विजयश्री मिल जानी है। कृष्ण के साथ होने का अर्थ होता है कि अब आपको एक ऊँचा जीवन युद्ध मिल जाना है। मज़े की बात है कि युद्ध जितना ऊँचा होगा, उसमें जीतने की संभावना उतनी ज़्यादा होगी। युद्ध जितना दुरूह और दुष्कर होगा, जीतने की संभावना उतनी ज़्यादा होगी। ये बात हमारे पल्ले ही नहीं पड़ती। हमें लगता है युद्ध जितना आसान होगा, जीतने की संभावना बढ़ेगी। भौतिक जगत में ऐसा होता है, अस्तित्व में ऐसा नहीं होता।
अस्तित्व में जितना गहन, जितना विकट, जितना असम्भव युद्ध होता है, आपके जीतने की संभावना उतनी बढ़ जाती है। आप जीत जाते हो, सिर्फ़ इस वजह से कि आपने एक बड़ा असम्भव युद्ध चुना।





