श्रोता:सर, हम कैसे अपने निजता को पाएं? जब सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है, तब हम उसे खो देते हैं।
वक्ता:तुम्हारा नाम क्या है?
श्रोता:अभिषेक।
वक्ता:अभिषेक, ये कितने लोग ने देखा है कि जो भी कुछ आपको पता है, इसको आप ज़िन्दगी का मूल कह सकते हो, कहीं से भी जाना हो, एच.आई.डी.पी से भी जाना हो सकता है, या कहीं और से भी, जो भी कुछ आपको पता है, वो आपके तभी काम नहीं आता जब उसकी ज़रूरत होती है।
जब तुम्हें उसकी ज़रूरत होती है, जब उसकी वास्तविक ज़रूरत होती है ज़िन्दगी में अमल करने की, उस वक़्त तुम पाते हो कि ये किसी काम का नहीं है। वो एक सिद्धांत या नियम के रूप में तो ठीक है, लेकिन जब वक़्त आता है उसे ज़िन्दगी में अमल में लाने का, तब तुम पाते हो कि वो बात उतरी नहीं ज़िन्दगी में। बहुत सारी बाते हैं, जो सिद्धांत रूप में पता हैं, और सोचने पर ठीक भी लगती है, लेकिन जब जिन्दगी में उन्हें अमल करने की बात आती है, तो वो मौका चूक जाता है।
ऐसा कितने लोगों के साथ होता है?
(सभी श्रोतागण अपने हाथ खड़े कर लेते हैं।)


