बचपन से ही पीते हो प्रभावों की घुट्टी || आचार्य प्रशांत, युवाओ के संग (2012)

प्रश्न: आचार्य जी, ये घटना मेरे साथ घट चुकी है, वो बता रहा हूँ । एक बार मैं अपने घर, लखनऊ जा रहा था । तो एक माँ और उनके साथ एक बहुत छोटा बच्चा बैठा था । मैं उनके पास ही बैठा था । रास्ते में एक पेड़ पड़ा, उस पर कुछ बंदर बैठे हुए थे । तो उन्होंने बहुत प्यार से बोला, देखो वो बन्दर बैठा है पेड़ पर । तो मैंने सोचा, इतना छोटा बच्चा है, अभी से क्या मतलब सिखा रही हैं !
कुछ देर बाद, उन्होंने बच्चे को ‘बद्तमीज़ कहीं के’ बोला और एक थप्पड़ लगाया ।
तो मैं ये पूछना चाहता हूँ, कि माता-पिता बचपन से ही बच्चों को क्यों घुट्टी पिलाना चाहते हैं?
आचार्य प्रशांत: राहुल का सवाल वही है, कि ये समाज आखिर ऐसा है क्यों? पर उसको और बारीक़ी से देखेंगे ।
पहली बात राहुल ने कही, कि अभिवावक ऐसे क्यों हैं?
देखिए, तो बात इससे शुरू करते हैं, कि ‘अज्ञान पर किसी का हक़ नहीं है’ । ‘नासमझी’ किसी की बपौती नहीं हैं । कोई भी नासमझ हो सकता है । जहाँ तक परवरिश की बात है, पालन-पोषण की बात है, तो वो एक पूर्णतः जैविक प्रक्रिया है । या ये कहना चाहिए कि ‘प्रजनन’ एक पूर्णतः जैविक प्रक्रिया है । हर जानवर बच्चा पैदा कर लेता है । कोई जानवर, कोई प्रजाति, ऐसी नहीं होती जो ना जानती हो, कि बच्चे कैसे पैदा किए जाते हैं ।
