वक्ता: तुम्हें कुछ पसंद नहीं आ रहा ना? उस बिंदु पर प्रतिक्रिया करने के दो तरीके होते हैं। समझना इस बात को। आमतौर पर हमें ये सिखाया जाता है कि अगर कुछ पसंद ना आए तो उसे बदलने की कोशिश करनी चाहिए और इस बात को बड़े विद्वान लोग भी बोल गए गये हैं कि इसको बदलो। ‘अगर कुछ ठीक नहीं लग रहा है तो हाथ पर हाथ रख कर मत बैठो, उसे बदल डालो’- ये बात नासमझी की है। कुछ पसंद ना आ रहा हो तो इसका मतलब सिर्फ ये है कि तुम उसको समझते नहीं हो, क्योंकि अस्तित्व में नापसंद करने लायक कोई चीज़ होती नहीं है।
पसंद और नापसंद नहीं होती, सिर्फ समझ और नासमझी होती है।
अगर उसका अस्तित्व है, तो वो दिव्य है। वो एक स्वप्न भी हो सकता है, एक कल्पना, पर उसमें कोई बुराई नहीं होती। कुछ भी घृणित नहीं होता। आपको उसे सिर्फ़ समझना होता है।
यहाँ तक की मृत्यु – शारीर की मृत्यु भी कोई शोक मनाने वाली बात नहीं है। आमतौर पर मृत्यु को सभी नापसंद करते हैं। किसी की मौत हो जाए तो सभी को बुरा लगता है। मृत्यु में भी, कुछ भी शोक करने जैसा नहीं है। मृत्यु भी एक उत्सव हो सकती है, अगर आप उसे ठीक-ठीक समझें।
इसीलिये कुछ भी बदलने की चेष्टा मतकीजियेकरो। कुछ भी बदलने की चेष्टा करना बेवकूफ़ी है। केवलसमझियेऔर अगर उस समझ से कुछ बदलाव आना होगा, तो अपने आप आ जाएगा।

