बाहरी प्रभावों से कैसे बचा जाए? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2013)

प्रश्न: आचार्य जी, बाहरी प्रभावों से कैसे बचा जाए?
आचार्य प्रशांत: (सत्संग शुरू होने के कुछ समय पहले आचार्य जी ने कुछ श्रोताओं को शांत होकर बैठने के लिए कहा। उसी बात का उल्लेख आचार्य जी ने उदाहरण के रूप में लिया।)
अभी मैं डाँट रहा था। उस वक़्त मैं ये भूल नहीं सकता कि ये जो बाकी लोग बैठे हैं, कहीं डाँट इतनी तगड़ी ना हो जाए कि ये लोग भी डर जाएँ। ऊपर-ऊपर से बहुत ज़ोर से डाँटना है, पर अंदर ही अंदर शांत भी रहना है।
एक और उदाहरण देता हूँ।
तुम लोग मैच तो खेलते ही होगे? खेलते हो ना? तो दो बल्लेबाज़ हैं। स्थिति यह है मैच की कि आख़िरी के पाँच ओवर हैं, और रन चाहिए पैंसठ। तो मतलब कैसी बल्लेबाज़ी करनी है? तीस गेंदों पर पैंसठ रन चाहिए, तो कैसी बल्लेबाज़ी करनी पड़ेगी? कैसी करनी पड़ेगी?
प्रश्नकर्ता: पीटना पड़ेगा।
आचार्य प्रशांत: अंधाधुन्द मारना ही है! कोई भी बॉल छोड़ नहीं सकते। दोनों बल्लेबाज़ों को ही मारना पड़ेगा। दोनों ही ठीक-ठाक बल्लेबाज़ हैं। लगा लो के अभी पाँच मिनट खेले हैं। और बाहर से दोनों ही उत्तेजित हैं, खूब दौड़ रहे हैं, तेज़ दौड़ रहे हैं। है ना? बाहर निकल-निकल के मार रहे हैं। दोनों ही बाहर से उत्तेजित दिख रहे हैं। बाहर-बाहर से दोनों ही कैसे दिखाई पड़ेंगे?

