डिप्रेशन या अवसाद का कारण || आचार्य प्रशांत (2019)

प्रश्न: आज से पचास-साठ साल पहले एक मानसिक रोगी को जितनी एंग्जायटी(उत्कंठा) महसूस होती थी, उतनी आज एक सामान्य युवा को महसूस होती है। आचार्य जी, मेरा सवाल ये है कि आपके अनुसार इसके कारण क्या हैं। और अगर हम इस समस्या का हल नहीं निकाल पाते हैं, तो हमारा भविष्य कैसा होगा?
आचार्य प्रशांत जी: बहुत अच्छा प्रश्न पूछा है। नाम क्या है तुम्हारा?
प्रश्नकर्ता: मोहित शर्मा।
आचार्य प्रशांत जी: मोहित ने कहा, “आज से पाँच दशक पहले जितनी एंग्जायटी एक मानसिक रोगी को होती थी, उतनी एंग्जायटी आज आम है – स्कूलों में, कॉलेजों में। और ये बात अनुमान के आधार पर नहीं है, ये आँकड़े हैं, ये नम्बर्स हैं, ये रिसर्च (अनुसंधान) है, ये डेटा(तथ्य) हैं। हम सब किसी-न-किसी तरीके से परेशान हैं, निराश हैं। कोई चिंता है, दिमाग पर बोझ है। ये बात कहने की नहीं है, ऐसा हो रहा है। परीक्षण करके अगर नापा जाए, तो हम सबका यही हाल निकलेगा। यहाँ भी यही हाल निकलेगा। कोई चीज़ है जो परेशान करे ही जा रही है, करे ही जा रही है। तो पूछा है कि – बात क्या है?
बात क्या है? दो पक्ष हैं उसके। दोनों को समझ लेंगे।
पहली चीज़ ये है कि वैज्ञानिक क्रांति के बाद जितने विषय हो सकते हैं पाने के लिए, उनमें बेतरतीब वृद्धि आ गई है। आज से पचास साल पहले, जितनी चीज़ें हो सकती थीं, कि जिन्हें पाया जा सकता था, आज उससे सौ-गुना चीज़ें मौजूद हैं। न सिर्फ़ वो मौजूद हैं, वो तुम्हें हर समय अपने आप को प्रदर्शित कर रही हैं। तो उपभोग करने की जितनी वस्तुएँ उपलब्ध हैं, उनमें बड़ी तेज़ी से वृद्धि हुई है।
