निःसंगो निष्क्रियोऽसि
त्वं स्वप्रकाशो निरंजनः।
अयमेव हि ते बन्धः
समाधिमनुतिष्ठति॥१-१५॥
आप असंग, अक्रिय, स्वयं-प्रकाशवान तथा सर्वथा-दोषमुक्त हैं। आपका ध्यान द्वारा मस्तिस्क को शांत रखने का प्रयत्न ही बंधन है ॥15॥
~ अष्टावक्र गीता
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अष्टावक्र इस श्लोक में ऐसा क्यों कह रहे हैं कि ध्यान की हर विधि बंधन है?
आचार्य प्रशांत: जब आप अपने आप को कहीं से दूर मानते हैं, तभी उस जगह की ओर जाने की कोशिश करते हैं। ध्यान में आप एक लक्ष्य बनाते हैं और लक्ष्य बनाने की सर्वप्रथम ज़रुरत ही इसीलिए पड़ती है क्योंकि आप अपने आपको लक्ष्य से अलग/इतर् मान रहे हैं।






