गुरु से सीखें या जीवन के अनुभवों से? || आचार्य प्रशांत, आजगर गीता पर (2020)

इदमिदमिति तृष्णयाऽभिभूतं जनमनवाप्तधनं विषीदमानम् ।
निपुणमनुनिशाम्य तत्त्वबुद्ध्या व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ।।
जो ये मिले, वो मिले—इस तरह तृष्णा से दबे रहते हैं और धन न मिलने के कारण निरंतर विषाद करते हैं, ऐसे लोगों की दशा अच्छी तरह देख कर तात्विक बुद्धि से संपन्न हुआ मैं पवित्र भाव से इस आजगर-व्रत का आचरण करता हूँ।
(अजगर गीता, श्लोक 28)
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अपगतभयरागमोहदर्पो धृतिमतिबुद्धिसमन्वितः प्रशान्तः ।
उपगतफलभोगिनो निशाम्य व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ॥
मेरे भय, राग, मोह और अभिमान नष्ट हो गए हैं। मैं धृत, मति और बुद्धि से संपन्न एवं पूर्णतया शांत हूँ और प्रारब्धवश स्वतः अपने समीप आई हुई वस्तु का ही उपभोग करने वालों को देखकर मैं पवित्र भाव से इस आजगर-व्रत का आचरण करता हूँ।
