प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कभी मैं हीनभावना से ग्रस्त होता हूँ और कभी श्रेष्ठता की भावना से, पर सहज नहीं रह पाता। कृपया मार्गदर्शन प्रदान करने की कृपा करें।
आचार्य प्रशांत: बात इसकी नहीं है कि हीनभावना से ग्रस्त हो या बड़प्पन का बहुत अहंकार आ गया है, बात ये है कि अपने बारे में सोचते बहुत हो। सोच के साथ बात ये है कि वो सदा किसी परिपेक्ष में चलती है। तुम किसी चीज़ के बारे में सोच ही नहीं सकते बिना किसी पृष्ठभूमि के। देखो, यहाँ (शिविर कक्ष में) जितनी भी चीज़ों को देख रहे हो, हर एक के पीछे कोई पृष्ठभूमि है न? इस पर्दे की ओर देखिए। क्या संभव है पर्दे की ओर देख पाना बिना इसकी सीमाओं को देखे? पर्दे का अर्थ ही है एक सीमित वस्तु, पर्दे का अर्थ ही है पर्दे की सीमाएँ। और पर्दे की सीमाएँ जहाँ आईं, वहाँ दीवार आ गई। पर्दे को देखा, दीवार की पृष्ठभूमि पर।
मन के जगत में जो भी चीज़ उठेगी, उसके पीछे ज़रूर कुछ होगा। वो दिखाई ही सदा पीछे की वस्तु के संदर्भ में देगी। 'एक' को न तुम देख सकते हो, न सोच सकते हो। जब भी तुम्हें दिखेंगे, 'दो' ही दिखेंगे। इस बात को अच्छे से पकड़ लो। मन में 'एक' नहीं हो सकता, मन की गिनती शुरू 'दो' से होती है। फिर दो के बाद तीन, चार, पांच... अनंत। शून्यता संभव है मन मिट जाए तो, और द्वेत लाज़मी है अगर मन बना हुआ है तो। 'एक' असंभावना है, 'एक' बिलकुल असंभव है।
अब जो व्यक्ति डरा हुआ है, जो व्यक्ति अपने को लेकर शंकित है, वो अपना विचार करेगा। जब वो अपना विचार कर रहा है, तो वो सोच रहा है, "मैं किसी एक का विचार कर रहा हूँ।" उसकी दृष्टि में वो 'एक' वो स्वयं है। वो सोच रहा है, "मैं अपने बारे में सोच रहा हूँ।" पर 'एक' के बारे में तो सोचा जा नहीं सकता। एक के पीछे खड़ा होगा सदैव कोई दूसरा।
तो 'एक' जब भी तुम्हारे सामने आएगा दूसरे के संदर्भ में आएगा माने दूसरे की तुलना में आएगा। अपने बारे में जब भी विचार करोगे तुलनात्मक तौर पर ही करोगे। दूसरे की अनुपस्थिति में तुम्हारी कोई उपस्थिति संभव नहीं है। दूसरे को बनाओगे तुम दीवार, नेपथ्य, पृष्ठभूमि, और उसके आगे तुम खड़े हो जाओगे। दो हो गए, तो तुलना होगी। तुलना जब भी होगी, तो नतीजे में या तो छुटपन आएगा या बड़प्पन आएगा, तो कभी लगेगा छोटे हैं, कभी लगेगा बड़े हैं।

