आचार्य प्रशांत: क्या नाम है?
श्रोता: सर, राकेश।
वक्ता: राकेश, ये सवाल पूछना ज़रूरी था क्या? तुम्हारे लिए था ज़रूरी? तुमनेंं, तुम्हारे बगल में जो बैठा है, उससे अनुमति ली क्या सवाल पूछने के लिए? जो उधर बैठा है, उससे अनुमति ली? मेरे हाथ में माइक है, मुझसे अनुमति ली? किसी से नहीं ली ना।
तुम्हारे मन में बात उठी, और तुम स्पष्ट हो कि जीवन में ये एक ज़रूरी सवाल है, तो तुमने पूछा। या कि बहुत तुमने सोच विचार किया था? तुम योजना बना कर के बैठे थे, कि ये सवाल पूछोगे? नहीं ना?
तुम्हें क्या यह पता था कि इस सत्र में, इस बिंदु पर आकर के मैं कहूँगा कि अब आप लोग बोलिये? किसी को भी पता था क्या? तो निश्चित रूप से उसने योजना तो नहीं बना रखी है। न उसने योजना बनाई, न अनुमति ली। उसे बोलना था, तो उसने बोला। जीवन ठीक ऐसे ही है। जिसे नहीं बोलना, वो अनुमति नहीं लेगा, वो योजना नहीं बनाएगा। और वो तयारी भी नहीं करेगा। ये जो तीनो हैं, उनमें किसी से उसका वास्ता नहीं रहेगा।
न प्रिपरेशन, न प्लानिंग, न परमिशन । सच तो है। उसकी क्या तैयारी करनी। झूठ की ही तैयारी होती है। और इसने तैयारी करी होती तो शायद ये पूछ न पाता। ये सच्चा सवाल है, इसको ये पूछ न पाता। बात आ रही है समझ में कुछ – कुछ?


