वक्ता: जो कुछ भी ज़िंदगी में कीमती है, इज्ज़त के लायक है, उसको अगर तुम कीमत देते हो, आदर देते हो तो उसका तुम कोई बहुत भला नहीं कर देते, उसका कोई हित नहीं हो जाता| क्योंकि वो ऊँचा है तभी तो कीमती है और जो पहले से ही ऊँचा है उसको हमसे क्या चाहिये? लेकिन अगर हम उसे इज्ज़त देते हैं, कीमत देते हैं और लगातार यादरखते हैं तो हमारा जरूर भला हो जाता है| और वो जो याद रखना है वह ऐसी चीज़ नहीं होती कि किसी खास मौके पर कर ली गई|
सारी धार्मिकता, आध्यात्मिकता, प्रज्ञता के केंद्र में एक बात होती है “सतत सुरती”, कांस्टेंट रिमेम्ब्रेंस – लगातार याद रखना और लगातार का मतलब है तब भी याद रखना और तब ही ज्यादा याद रखना जब दूसरी चीज़ें खींच रही हों, आकर्षित कर रही हों, मन कहीं और को भाग रहा है तब याद रखना है| इसीलिए भारत में प्रतीकों की, रिवाजों की, और रीचुअल्स की बड़ी कीमत रही है| हम अक्सर उनको यह बोलकर ठुकरा देते हैं कि यह सब तो यूँ ही है, आचरणगत बातें हैं, इन में कुछ रखा नहीं है| उनमें ही बहुत कुछ रखा है|
आप मंदिर के बगल से निकल रहे हों और आपके मन में दुनिया भर के अंट-शंट विचार उमड़-घुमड़ रहे हैं जैसा की आमतौर पर चलते रहते हैं मन में| लेकिन मंदिर को देखते ही अगर आप एक क्षण को रुके और आपने नमस्कार कर लिया मंदिर को तो जो विचारों का पूरा बहाव है, जो पूरी श्रृंखला है, वह टूट जाती है| क्योंकि वह एक लगातार बहने वाला निरंतर प्रवाह था ना, एक कंटीन्यूईटी थी| तुम रुके, थमे, तुमने मंदिर की ओर देखा और तुम ने हाथ जोड़ लिए, तुमने सर झुका दिया, तो जो श्रृंखला थी ख्यालों की वो टूट गई| किसका भला हुआ? भगवान का या तुम्हारा?
श्रोतागण : (एक साथ) हमारा|
वक्ता: और तुम सोचते हुए जा रहे थे, “कल मेरा क्या होगा, मेरी फलानी चीज़ें फँसी हुई हैं, उनका क्या होगा” और दुनिया भर के तुम्हारे दिमाग में ख्याल चल रहे थे और ख़याल तो हमेशा आगे के ही होते हैं उनमें कहीं ना कहीं डर और चिंता और दुःख छुपा ही होता है| और अगर तुमने अपने लिए यह एक रस्म ही बना रखी है कि मैंने रुक कर के मंदिर को प्रणाम करना है जहाँ भी दिखाई दे, बस एक क्षण के लिए ही सही तो इसमें किसका भला कर रहे हो? भगवान का या अपना ?

