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आचार्य प्रशांत: नैन्सी का सवाल है कि, ‘अगर बताया गया कि अहंकार ‘मैं’ है तो इसके साथ बड़ी समस्याएं हैं, वो एक बीमारी के तरह भी है, पर क्या जीवन में कुछ भी ऐसा है जो इस मैं से मुक्त है?’
नैन्सी, ‘मैं’ को हम कभी अनुभव नहीं करते, हम अपने विशुद्ध होने को बिलकुल नहीं जानते, ध्यान देना इस बात पर तुमने कभी भी यह नहीं कहा होगा कि ‘मैं हूँ’, तुमनें यह बिलकुल कभी भी नहीं कहा होगा कि ‘मैं हूँ’, तुम हमेशा कहती हो, ‘मैं नैन्सी हूँ’ या कि ‘मैं भारतीय हूँ’ या कि ‘मैं लड़की हूँ’ या कि ‘मैं इस प्रान्त की हूँ’; ‘मैं हूँ’ के साथ तुमने हमेशा कुछ-न-कुछ ऐसा जोड़ दिया है जो बाहरी है, जो तुम नहीं हो।
‘मैं हूँ’ तुम्हारे होने की घोषणा है, बात बिलकुल ठीक है, और ‘मैं हूँ’ पूर्णतय विशुद्ध वक्तव्य है, इसमें कोई मिलावट नहीं है, ‘मैं हूँ’ बात ठीक है, और इस बात से कोई बहस नहीं की जा सकती कि तुम हो, ये परम सत्य है कि तुम हो, पर ये बात परम झूठ है कि तुम कुछ और हो।
यह बात समझ में आ रही है?
कि तुम्हारा होना तो पूरी तरह सच है, पर तुम्हारा कुछ और होना उतना ही बड़ा झूठ है। पर तुम सिर्फ अपने होने को तो कभी जानते नहीं न, तुम तो अपने कुछ होने को जानते हो, और यह वैसा ही है कि किसी बहुत साफ़ चीज़ में, यह कह लो कि साफ़ पानी में एक बूँद ज़हर की मिलावट कर दी जाए, तो पूरे पानी को ज़हरीला बनाने के लिए वो कुछ बूँद काफी है, विशुद्ध रूप से अपने होने का एहसास हमें होता कहाँ है, हम हमेशा अपने व्यक्तित्व में जीते हैं न,


