प्रश्नकर्ता: ऊँचा जीवन कैसे जीएँ? आदर्शों को अपने जीवन में कैसे अपनाएँ?
आचार्य प्रशांत: जिसको भी तुम मानते हो अपने से ऊँचा, जिसको भी सम्माननीय मानते हो, उसकी छवि लगातार आँखों में बसी रहे। और आँखें ऐसी हैं नहीं कि जब तक वो भौतिक रूप से न देखें तब तक उनमें छवि बैठी रहे। तो भौतिक रूप से ही सही, एक तस्वीर लाकर टाँगो। कोई ऐसा जिसके सामने झुकने की तबीयत किया करे; कोई भी ऐसा। वो कोई काल्पनिक पात्र भी हो सकता है, वो किसी उपन्यास का भी पात्र हो सकता है, कोई बात नहीं।
कोई ऐसा होना चाहिए न, जिसका दर्शन-मात्र तुम में तड़प जगा देता हो, चाहत जगा देता हो बदल जाने की। और साथ-ही-साथ तुम्हें शर्म से भर देता हो, अगर बदल नहीं रहे हो।
उसकी छवि आँखों के सामने होनी चाहिए। उसके वचन लगातार कानों में पड़ते रहने चाहिए। उस व्यक्ति को तुम्हारे सामने एक चुनौती की तरह लगातार मौजूद होना चाहिए। चुनौती क्यों है, समझ रहे हैं न? "कहाँ पहुँच गए ये, और कहाँ रह गए हम! हाड़-माँस के तो ये भी थे, कि नहीं थे? हमारी ही तरह पैदा हुए थे। हमारी ही तरह अन्न, जल, और वायु का सेवन करते थे। इसी ज़मीन पर चलते थे। वो कैसे, कहाँ निकल गए!"
ज़रा अपमान का अनुभव होना चाहिए। अपमानित तो हम छोटी-छोटी बातों पर अनुभव करते ही हैं, कि नहीं? कहीं बैठे और किसी ने पानी को नहीं पूछा, तत्काल बुरा लग जाएगा - "अरे! अपमान हो गया।" बड़ा अपमान क्यों नहीं अनुभव करते?
ये सब जितने बड़े साहब हो गए हैं, इन सबके सामने बड़ा अपमानित अनुभव करना चाहिए। उनका वजूद हमारे मुँह पर तमाचे की तरह है। निरंतर लज्जा बनी रहनी चाहिए। जैसे गाल पर पाँच उंगलियों के निशान अभी ताज़ा-ताज़ा हों तो लाज बनी रहती है न? अभी-अभी पड़ा है कान के नीचे एक बढ़िया वाला। कुछ देर तक तो लाज बनी रहती है न। समझ लो वो कृष्ण का चाँटा है। गाल पर कृष्ण की उँगलियों के निशान लगातार मौजूद रहें।

