और यह दुनिया का सबसे कठिन काम बन गया है जो सबसे आसान होना चाहिए। मुट्ठी भर लोग नहीं होंगे जो 'सुनना' जानते हैं। मुट्ठी भर लोग नहीं होंगे जो 'देखना' जानते हैं और मुट्ठी भर लोग नहीं होंगे जो वास्तव में 'जानते' हैं। हमें लगता है कि हम देख रहे हैं पर हम कुछ नहीं देख पाते। तुम हिंदू हो तो मंदिर के सामने से निकलते हो, तुम मंदिर नहीं देख पाते। तुम्हें अपनी सारी कहानियाँ याद आ जाती हैं। तुम मुसलमान हो तो मंदिर के सामने से निकलते हो, तुम भी कुछ नहीं देख पाते। तुम्हें भी दूसरी कहानियाँ याद आ जाती हैं। हम कुछ देख नहीं पाते, हमें कुछ नहीं दिखाई पड़ता। हम कुछ जान नहीं पाते, हम कुछ सुन नहीं पाते। तुम्हारे सामने एक व्यक्ति बोल रहा है तुम उस व्यक्ति को नहीं सुनते तुम कहते हो "ये तो मेरे पिता बोल रहे।" अब तुम नहीं सुन पाओगे। दूसरा व्यक्ति आएगा और कहेगा यह मेरा कौन लगता है? वह भी नहीं सुन पाएगा। वो 'सुनना' जो इतनी सहज घटना थी, वह हमारे साथ घटती ही नहीं। हम बिना देखे, सुने, जाने पूरा जीवन बिता देते हैं और उन्हें सब से कम देखते, जानते, सुनते हैं जो हमारे सबसे करीब हैं। बाप, बेटे को कभी नहीं जान पाता, भाई, भाई को कभी नहीं सुन पाता क्योंकि उसे पहले ही पता है कि यह भाई है, वह उसे व्यक्ति जानता ही नहीं, वह उसे भाई जानता है। पति पत्नी को कभी समझ ही नहीं पाता, वह दुनिया को समझ लेगा होगा बड़ा विद्वान, अपनी ही पत्नी को कभी नहीं समझ पाएगा क्योंकि उसे पता है कि यह 'पत्नी' है। तुम्हें पहले ही पता है तो तुम क्या देखोगे? क्या सुनोगे? क्या जानोगे?