वक्ता: तो हम पूछ रहे हैं कि जब इन पक्षियों के पास कुछ करने को नहीं है तो यह इतने मज़े क्यों कर रहे हैं, इतना इधर-उधर भाग क्यों रहे हैं, उड़ क्यों रहे हैं?
क्योंकि तुम्हारा सबसे बड़ा खौफ़ ही यही है कि अगर तुम्हारे पास कुछ करने को नहीं होगा तो तुम मुर्दा जैसे हो जाओगे! यही खौफ़ है ना? और दुनिया तुम्हें यही बताती है कि अगर कोई उद्देश्य नहीं होगा, कुछ हासिल नहीं करना होगा, तो तुम बेकार हो जाओगे, आलसी।
यहाँ तो कहानी दूसरी है – जिनके पास कुछ करने को नहीं है वो अति उद्द्यमी हैं। कोई मोटी चिड़िया देखी है? मोटी मछली, (हँसते हुए) जो तैर नहीं पा रही है? एकदम-से मोटी हो गयी है, देखी है? अब उसको पीने को पानी मिला हुआ है, सब है, उसके बाद भी वो सही है, काम करती रहती है, मज़ेदार है एकदम! ये देखो (एक चिड़िया की तरफ इशारा करते हुए) चीं-चीं-चीं कर रही है। ये चीं-चीं करने से इसको कौन-सा खाना मिल गया? ये किस बात पर इतनी आवाज़ कर रही है? इसका क्या उद्देश्य सिद्ध हो रहा है? क्या हासिल हो रहा है?
श्रोता १: पता नहीं।
वक्ता: तो फिर क्यों? क्या है मतलब? कुछ तो बात होगी ना? इसका राज़ क्या है? उदास भी नहीं लग रही, या लग रही है? (चिड़िया को दिखाते हुए) देखो, तुम बैठे हो, वो ऊपर से देख रही है। किस बात की ख़ुशी है उसको?

