प्रश्नकर्ता: सर भाषा से मन बनता भी है और प्रदर्शित भी होता है। बचपन से ही कुछ मुहावरे, जुमले इतने ज़्यादा सुने कि अब वो भीतर की धारणा बन गए हैं। मैं चाहता हूँ कि आप इन पर कुछ बोलें। कुछ उदाहरण हैं — आइए अपना ही घर समझिए, बी पॉजिटिव, भगवान पर भरोसा रखो, दुनिया ऐसे ही चलती है, सीखो डूब कर, ऊपर वाला जो करता है सही ही करता है। इसी तरह के कई अन्य मुहावरे और लोकोक्तियाँ हैं। बचपन से ही हमें इनके द्वारा संस्कारित कर दिया जाता है। कुछ कहिए।
आचार्य प्रशांत: जान तो तुम खुद ही रहे हो कि ये सब बातें कैसी हैं। मेरे मुँह से लेकिन सुनना चाहते हो। दिख भी रहा है कहीं गंदगी है पर साफ़ मुझसे करवानी है। चलो भई झाड़ू लगाते हैं।
'आइए अपना ही घर समझिए।' कहाँ से शुरू करूँ? जो कह रहे हैं कि आइए इसे अपना ही घर समझिए वह खुद बड़े बेघर हैं। तुम दूसरे को क्या बता रहे हो कि, "मेरे घर को अपना घर समझो"? तुम्हारे पास ही कहाँ घर है। तो पहला झूठ तो यह कि तुम दूसरे को कह रहे हो कि मेरे घर को अपना समझो जबकि तुम ही बेघर हो। और दूसरा झूठ यह कि दूसरे से तुम्हारा ऐसा कोई प्रेम नहीं है कि तुम अपनी कोई बड़ी कीमती चीज़ उसके साथ बाँट लोगे।
वह वाकई ही अगर तुम्हारे घर को अपना घर समझने लगे तो बड़ी दिक्कत हो जाएगी तुमको। तो तुम वास्तव में उसे मूर्ख बना रहे हो, धोखा ही दे रहे हो। तुम कह रहे हो — आइए अपना घर समझिए। अब वह बेचारा अगर सीधा-सादा हुआ तो वह तो कहेगा कि, "इन्होंने मुझे बहुत बड़ी चीज़ दे दी, इतना अपनापन। अपनी पूरी कोठी मेरे हवाले कर दी तो बदले में मेरा भी कुछ कर्तव्य बनता है।" फ़िर वह भी तुम्हें कोई बहुत कीमती चीज़ दे देगा। और यही तुम चाहते हो। किसी से झूठ बोलने का कुछ-न-कुछ मकसद तो होता है न। जब तुम किसी से कहते हो कि, "आओ-आओ।" जैसे छोटे बच्चे करते हैं स्कूल के दिनों में।
मेरी माता जी को बड़ा शौक था। बढ़िया वाला टिफिन तैयार करके दिया करें मुझे। उनको बड़ा डर रहा करे कि किसी भी क़ीमत पर यह जो स्कूल की कैंटीन में सामग्री मिलती है, समोसे वगैरह, यह खा ना ले। वो तो खैर मैं वैसे भी नहीं ले सकता था मुझे पैसे ही नहीं देते थे। तो सोचें कि कहीं किसी और के टिफिन का कुछ इसमें ना चला जाए। तो बढ़िया सामग्री वो मुझे दिया करें।

