युञ्जानः प्रथमं मनस्तत्त्वाय सविता धियः। अग्नेर्ज्योतिर्निचाय्य पृथिव्या अध्याभरता्।।
वह सविता (सबका उत्पादक) देवता हमारे मन तथा बुद्धि को परमात्मा में लगाते हुए हमारी इन्द्रियों को पार्थिव पदार्थों से ऊपर उठा कर उसमें दिव्य अग्नि का प्रकाश स्थापित करे, ताकि हम जगत के सार तत्व का ही अवलोकन करें।
~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय २, श्लोक १)
आचार्य प्रशांत: सविता या सावित्री या सविता-सावित्री के युग्म का उल्लेख उपनिषदों में बहुधा होता है।
तात्पर्य क्या है?
जैसा कि इस श्लोक में संकेत है, सविता तो सूर्यदेव हो गए और सावित्री हुईं सविता की अधिष्ठात्री देवी या अधिष्ठात्री शक्ति। अर्थ – स्थूल प्रकृति को सविता नाम से संबोधित किया है और सूक्ष्म प्रकृति को सावित्री नाम से। लेकिन सविता कहें, सावित्री कहें, अर्थ, तात्पर्य 'मूल प्रकृति' से ही है। और ज़्यादा शुद्ध तरीके से कहें तो तात्पर्य है 'मूल अहम् वृत्ति' से।
यहाँ पर सविता को कहा गया है वो जो प्रथम है। वो जो सबका उत्पादक है। तो वो जो प्रथम है, वो जिससे सब कुछ आता है, वो तो अहम् वृत्ति ही है।

