संसारी कौन? जो संसार से पूर्णतया अज्ञानी हो॥ आचार्य प्रशांत, श्री अष्टावक्र पर (2014)

तवैवाज्ञानतो विश्वं त्वमेकः परमार्थतः। त्वत्तोऽन्यो नास्ति संसारी नासंसारी च कश्चन॥ -अष्टावक्र गीता (१५.१६)
अनुवाद: अज्ञानवश तुम ही यह विश्व हो पर, ज्ञान दृष्टि से देखने पर केवल एक तुम ही हो, तुमसे अलग कोई दूसरा संसारी या असंसारी किसी भी प्रकार से नहीं है।
वक्ता: तुम्हें न जानने के कारण ही ब्रह्माण्ड विश्व दिखाई देता है। पारमार्थिक बात, आख़िरी सत्य तो ये है कि तुम ही हो, ‘त्वमेकः’। तुम्हारे अतिरिक्त न जीव है, न आत्मा है। प्रश्न है, ‘मैं कौन हूँ?’
तुम्हें न जानने के कारण ही विश्व दिखाई देता है, तुम्हें न जानने के कारण विश्व, विश्व जैसा लगता है, तुम्हें न जानने के कारण विश्व का वास्तविक स्वभाव पता नहीं चलता। तुम ने न जानने के कारण उसे आख़िरी मान लिया है, जो आख़िरी है नहीं। जैसे कि कोई परदे पर पड़ रही छाया को पकड़ने दौड़े, और उसे असली ही मान ले, जैसे कि कम उम्र के बच्चों को परदे पर आ रहे चरित्रों से प्रेम हो जाये।
ऐसा देखा है या नहीं? हम सब कम उम्र के बच्चे ही हैं। खबरें आती हैं ना कि तेरह-चौदह साल की लड़कियाँ किसी कसबे से भाग गईं, किसी अभिनेता से मिलने के लिए। हम वैसे ही हैं। पहली बात- जो परदे पर है वो, वो अभिनेता है ही नहीं। दूसरी बात- अभिनेता भी वो है नहीं, जो तुम उसे समझते हो।
धोखा देखिये कई तलों पर है। आपने तो बहुत आंशिक तथ्य देखा है। आप किसी अभिनेता की कोई फिल्म देखते हो, तो उसमें वो एक चरित्र अभिनीत कर रहा होता है, और दूसरे ही पल हो सकता है बगल के ही परदे पर, वो कोई और चरित्र अभिनीत कर रहा हो। यहाँ वो बना हुआ है एक दीवाना आशिक़, और बगल के परदे पर वो बना हुआ है एक कॉलेज का विद्रोही छात्र। पर आप चरित्र को देखते हो और सोचते हो कि यही बात पूरी है, हमने सत्य को जान लिया। आपको ये ज़रा भी पता होता कि यह सत्य नहीं है, तो आप कैसे अपने प्रेम को गंभीरता से ले सकते थे। आप अपने ऊपर ही हँसते कि ये कैसे आकर्षण में फँस रहा हूँ।




