वक्ता: क्या इस बात को समझ रहे हो? इस पल में जो है, उसी से तो अगला निकलता है। अगर ये पल ठीक नहीं है तो क्या अगला ठीक हो सकता है?
श्रोता १: उसका कोई कारण भी तो होना चाहिए?
वक्ता: जिसको तुम आगे जाना कह रहे हो, उसका तो कारण होगा ही, लेकिन वो मात्र कल्पना ही होगी। तुम इस बात को समझो। तुम आगे जाना किसको कह रहे हो? चलो इस बात को ऐसे समझो। मैं यहाँ बैठा हूँ, तुम एक सवाल पूछते हो, उसका तुरंत एक जवाब आ रहा है। बात आगे जा रही है ना? क्या सपने में जा रही है? क्या स्वतः ही हम आगे नहीं बढ़ते? अभी हम ध्यान से सुन रहे हैं; मैं तुम्हारी बात ध्यान से सुन रहा हूँ; तुम मेरी बात ध्यान से सुन रहे हो; क्या इस सुनने सुनाने के फलस्वरूप हम स्वतः ही आगे नहीं बढ़ रहे?
आगे बढ़ने के लिए क्या हम सपने में हैं या ध्यान में हैं? ध्यान में रहकर हम कितने अच्छे तरीके से आगे बढ़ रहे हैं। एक बात से दूसरी बात निकल रही है और हम कल्पनाओं में नहीं हैं, हमने कोई योजना भी नहीं बना कर रखी कि कौन-सा सवाल पूछें, कौन-सा नहीं। क्या हम पूर्वाभ्यास करके आये हैं? क्या मुझे पता है कि तुम कौन-से सवाल पूछोगे? क्या तुम्हें पता है कि मैं क्या जवाब दूंगा? जो कुछ हो रहा है, इसी क्षण में हो रहा है। और क्या इससे हम अपने आप आगे नहीं बढ़ रहे? बढ़ रहे हैं या नहीं बढ़ रहे? बढ़ रहे हैं ना!
श्रोता १: लेकिन सर, इस क्षण में आने के लिए भी हमने कुछ सोचा होगा?
वक्ता: अभी देखो कि क्या हो रहा है। और ये स्पष्ट प्रमाण है इस बात का कि आगे बढ़ने के लिए सपने नहीं, ध्यान चाहिए। आगे बढ़ने के लिए हकीकत से संपर्क होना चाहिए। और जब तुम जानते हो कि अभी क्या है, तो उसी के परिणाम स्वरुप अपने आप सब सही होता चला जाता है।


