सीता का मार्ग, और हनुमान का मार्ग || आचार्य प्रशांत, श्रीरामचरितमानस पर (2017)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब सीता और हनुमान दोनों ही राम तक पहुँचने के मार्ग हैं, तो इनमें मूलभूत रूप से क्या अंतर है?
आचार्य प्रशांत: एक है अपने को मिटा देना, और दूसरा है अपने को मिला देना।
मिटा देना ऐसा है कि जैसे कोई सपने से उठ गया हो, मिला देना ऐसा है कि जैसे नमक का ढेला पानी में घुल गया हो। अहंकार के लिए दो ही जगहें हैं: या तो सत्य के पाँव में, या सत्य की बाहों में। या तो पाँव पड़ जाओ, या गले मिल जाओ— दोनों ही समर्पण के मार्ग हैं। दिख जाए तुम्हें कि कुछ है जो तुमसे बहुत-बहुत बड़ा है, तो भी अहंकार गिर जाता है। तुम्हें दिख जाता है कि कुछ है जो तुमसे पार का है। तुम्हारी सीमाएँ हैं और उन सीमाओं के आगे कुछ है, और जो है, वह अति विशाल है; दिख जाए तुम्हें कि कुछ है जो बहुत प्यारा है, तो भी अहंकार गिर जाता है; दोनों ही स्थितियों में।
आप समझ ही गए होंगे कि हनुमान कहाँ हैं, सीता कहाँ हैं। या तो इतना प्रेम हो कि तुमसे तुम्हारी क्षुद्रताएँ छिन जाएँ; तुम भूल जाओ कि तुम छोटे हो, तुम सत्य को गले लगाने का दुस्साहस कर बैठो, और वह दुस्साहस तुम्हें मिटा दे। तुम गए, आलिंगनबद्ध हो गए। गले भी तुम किसके लगे हो? राम के; सत्य के; परम के। या फिर तुम विनम्रता से सत्य के चरणों में स्थापित हो जाओ; तुम हनुमान हो गए। इन दो के अलावा कोई तीसरा तरीक़ा होता नहीं समर्पण का। अपने से अति विराट को देख लो, या अति आकर्षक को देख लो।
हनुमान के लिए राम अति विराट हैं, बड़े-से-बड़े, ऊँचे-से-ऊँचे। हनुमान जब राम के पास आते हैं तो मिट जाते हैं। सीता जब राम के पास आती हैं तो मिल जाती हैं। मिट लो, चाहे मिल लो, एक ही बात है – दोनों ही सेतु हैं। तुम्हारे लिए कौन-सा उपयुक्त है, यह तुम्हारी दशा पर निर्भर करता है।

