प्रश्न: आचार्य जी, मुझे अपने बारे में बताना कि मैं कैसा हूँ। मुझे बहुत भय लगता है, खासकर के महापुरुषों, जैसे आपके सामने।
आचार्य प्रशांत: (हँसते हैं) महापुरुष किसको बोला? दोबारा मत बोलिएगा! (हँसते हुए) गाली दे रहे हैं?
ये अच्छा खेल है न? वही जिसकी चर्चा आज शुरू में करी थी। दूसरे को महापुरुष बना दो ताकि उससे कोई नाता रखना ही न पड़े। ठीक यही कहा है अभी, कि, “मुझे आपके सामने खुलना, आपको अपने दिल की बात बताना बड़ा मुश्किल लगता है क्योंकि आप तो साहब महापुरुष हैं।" बता ही नहीं पाएँगे। बिल्कुल नहीं बता पाएँगे। अगर मैं महामानव हो गया, और आप साधारण मानव, तो हमारा क्या रिश्ता हो सकता है? कुछ भी नहीं हो सकता। क्या रिश्ता है? कुछ नहीं।
और मुझे महामानव बना कर, आपने अपने आपको अधिकार दे दिया, लाइसेंस दे दिया, साधारण मानव बने रहने का। है न? और क्या कह रहे हैं आगे?
प्रश्नकर्ता (प्र): भय चला जाए, ऐसा कोई उपाय बताएँ।
आचार्य जी: वही कर रहा हूँ।
हम बदलना नहीं चाहते, इसके लिए हम तरीक़े-तरीक़े के उपाय करते हैं। एक उपाय ये है कि जो कोई हमसे आगे हो, उसको घोषित कर दो - ‘महापुरुष’, और फिर बोल दो, “वो तो महापुरुष हैं, मैं तो छोटा आदमी हूँ, तो मैं उनके जैसा जीवन थोड़े ही जी सकता हूँ।”

