सोया साधु जगाइए, करे नाम का जाप ये तीनो सोते भले, साकट सिंह और साँप
-संत कबीर
आचार्य प्रशांत: आध्यात्मिकता के प्राथमिक सूत्रों में ही यह है कि संत जो भी कहे, उस बात को संसार का नहीं मन का जानो, भले ही उसमें जो दृष्टांत दिया गया हो, वो सांसारिक हो। बात भले ही समाज की, जंगलों की, पहाड़ों की, पशुओं की, लोगों की, रूपए-पैसों की, कहीं की भी की जा रही हो, अगर संत ने की है तो जान लेना मन की ही की है। मन के अलावा संत का कोई और लक्ष्य होता नहीं। मन के अलावा, वो और किसी की बात करता नहीं।
कबीर कह रहे हैं - ‘सोया साधु जगाइए’ और कबीर कह रहे हैं - ‘साकट, सिंह, साँप सोते ही भले हैं।‘ साधु भी आपके ही भीतर है और साकट, सिंह, साँप भी आप ही के भीतर हैं। साधु है ‘आत्मा’ और साकट, सिंह और साँप इंगित करते हैं आपकी वृत्तियाँ, आपकी आदिम पशुता। आत्मा का जगना और वृत्तियों का लोप होना एक साथ ही होता है।
वास्तव में वृत्तियों का लोप होना ही आत्मा का जगना है क्योंकि आत्मा ना तो जगती है, ना सोती है सिर्फ़ मन कहता है आत्मा जगी या सोई, मन के सन्दर्भ में ही आत्मा का जागरण होता है अन्यथा ना आत्मा का जागरण है ना निद्रा है। आत्मा का जागरण वास्तव में मन का जागरण है आत्मा के प्रति।
सोया साधु जगाइए – मन में लगातार साधुता वास करती ही है। ‘साधु’ कौन? जिसे परम के अतिरिक्त और कुछ प्यारा ना हो, जो जान गया हो कि कुछ प्यारा हो कैसे सकता है, जब और कुछ है ही नहीं। जो यह समझ गया हो एक सत्य के अतिरिक्त बाकि सब छल है और अब उस सत्य के अतिरिक्त और किसी के प्रति गंभीर हो ना पाता हो क्योंकि अन्य जो कुछ है वो वास्तव में है ही नहीं, तो कैसे उससे प्रेम करे, कैसे उसके प्रति गंभीर हो जाए? वो साधु, जो सत्य में जीता हो, जिसे झूठ का जीवन प्यारा ना हो, वो कोई व्यक्ति नहीं है, वो साधु आपका मन ही है। आपका मन निरंतर आकृष्ट होता रहता है सत्य के प्रति।




