अर्जयित्वाखिलानर्थान् भोगानाप्नोति पुष्कलान्। न हि सर्वपरित्यागमन्तरेण सुखी भवेत्॥
कोई जगत के समस्त पदार्थों का उपार्जन करके अधिक-से-अधिक भोग प्राप्त कर सकता है, परन्तु सबका परित्याग किए बिना कोई सुखी नहीं हो सकता।
~ अष्टावक्र गीता, अध्याय १८, श्लोक २
आचार्य प्रशांत: बता रहे हैं अष्टावक्र कि आए ही क्यों हो उनके पास। वो कह रहे हैं कि कुछ हासिल करोगे तो अपने-आपको बढ़ाओगे। भोगोगे, भोक्ता बनोगे तो भोक्ताभाव, कर्ताभाव गहराता जाएगा। तुम यहाँ हासिल करने नहीं आए, तुम यहाँ पाने नहीं आए; तुम यहाँ खोने आए हो।
कहानी कहती है कि जनक ने निवेदन किया था कि “हो गया, जान गया सब कुछ। अब इस राज-काज से मुक्ति चाहिए। यहीं बसूँगा, आपके आश्रम में रहूँगा।”
अष्टावक्र ने कहा था कि “जब मुक्त हो गए तो अब किससे मुक्ति चाहिए?”
पहले तो तुममें फिर भी पात्रता न थी शासन करने की, अब जब जान गए हो तो जो भी करे जा रहे हो, उससे मुक्त ही हो, लगे रहो। अब तो अगर भागोगे तो यही दर्शाओगे कि ज्यों मुक्त नहीं हो। मुक्त हो तो जीवन फिर जो रंग सामने ला रहा है, उसी में रंगे रहो।




