प्रश्न: ‘ज्ञानयोगी’ और ‘कर्मयोगी’ में क्या अंतर है? आदमी कैसे जाने कि वह किस मार्ग पर है? जहाँ ज्ञान है वहीं कर्म है, जहाँ कर्म है वहीं ज्ञान है, तो इनमें भेद क्या है?
वक्ता: कोई भेद नहीं है। कोई भेद है ही नहीं। आप कहाँ से देख रहे हो, इसका भेद है। आप कहाँ पर खड़े हो, इसका भेद है। कौन बात कर रहा है, इसका भेद है। एक व्यक्ति होता है जिसकी दृष्टि आचरण पर होती है, वो अपनेआप को जब जानना चाहेगा, वो जब आत्म-ज्ञान भी चाहेगा, तो वो यही करेगा कि अपनी दिनचर्या को देखे, जीवन कैसा जा रहा है। इसके लिए भी उसके पास यही मापदंड होगा कि अपने कर्मों को देखे कि सुबह से शाम तक करता क्या है।
इस व्यक्ति की दृष्टि थोड़ी स्थूल है, कर्म दिखाई पड़ते हैं। इसमें कोई गलती नहीं है, ठीक है। हम सभी को कर्म दिखाई पड़ते हैं, आँखे देखती हैं – हाथ कहाँ को चल रहे हैं, क़दम किधर को जा रहे हैं, किसको क्या बोल दिया – सारे कर्मों पर नज़र है। तो ये स्वयं को जानने के लिए कर्म को देखता है। इसका जो प्राइमरी इंडिकेटर (प्राथमिक सूचक) है, जहाँ से ये संचालित होता है, वो कर्म है – तो आप इसको ‘कर्मयोगी’ कहलोगे। ये नहीं मानेगा कि जीवन पर कोई प्रभाव पड़ा है, कि कोई बदलाव आया है, जब तक इसे कर्मों में बदलाव नहीं दिखाई देगा।
और एक दूसरा व्यक्ति है, जो कहता है, “मुझे कर्मों की कोई विशेष चिंता ही नहीं है। मैं नहीं देख रहा हूँ कि कर्म दाएँ जा रहा है या बाएँ जा रहा है।” ये कह रहा है, “मुझे तो बस इस बात की चिंता है कि कर्म आ कहाँ से रहा है?जीवन संचालित किस बिंदु से हो रहा है? क्या कर रहा हूँ, यह बात गौण है। बात निकल कहाँ से रही है, वो प्रमुख है। मैं वहीं पर बैठूँगा, वहीं पर केन्द्रित रहूँगा,” – ये ज्ञानयोगी हो गया।
इसी कारण पारंपरिक रूप से भी ज्ञान मार्ग को ऊँचे से ऊँचा रखा गया है, क्योंकि वो सूक्ष्तम मार्ग है। जिन लोगों की नज़र इतनी पैनी नहीं कि वो मन में झाँक कर देख सकें, जिनको सिर्फ़ स्थूल नज़र आता है, कर्म का मार्ग उनके लिए है। फिर बढ़ते-बढ़ते स्थितियाँ कुछ ऐसी बनीं, कि कर्म का मार्ग एक प्रकार से आचरणबद्धता का मार्ग हो गया। तो ‘कर्मयोग’ का अर्थ ये बन गया कि जो लोग इस-इस प्रकार का आचरण करते हों, वो कर्मयोग के पथ पर हैं। ऐसा कुछ बन गया। लेकिन बात बिल्कुल ठीक है – कर्म ही ज्ञान है, ज्ञान ही कर्म है – पर किसके लिए? हमेशा सवाल ये पूछना चाहिए, “किसके लिए?”



