तुम्हें हक़ क्या है शिक़ायत करने का? || आचार्य प्रशांत, यीशु मसीह पर (2014)

“But, who are you, O man, to talk back to God? Shall what is formed say to Him who formed it, “Why have you made me like this?” Does not the potter have the right to make from the same lump of clay one vessel for special occasions and another for common use?”
Romans 9:20, 9: 21
मनुष्य, भला तू कौन है, जो परमेश्वर का साम्हना करता है? क्या गढ़ी हुई वस्तु गढ़ने वाले से कह सकती है कि तू ने मुझे ऐसा क्यों बनाया है? क्या कुम्हार को मिट्टी पर अधिकार नहीं, कि एक ही लौंदे मे से, एक बरतन आदर के लिये, और दूसरे को अनादर के लिये बनाए? तो इस में कौन सी अचम्भे की बात है?
रोमंस (9:20, 9: 21)
आचार्य प्रशांत: ये सवाल उठाना फ़िज़ूल है कि मेरी परिस्थिति ऐसी क्यों है? देखो हम चाहते क्या हैं? हम चाहते ये हैं कि मैं तो बना रहूँ, मैं जैसा हूँ, मैं बना रहूँ, परिस्थितियाँ बदल जाएँ, बेहतर हो जाएँ।
तुम क्या हो? तुम प्यासे हो। तुम प्यासे क्यों हो? क्योंकि तुम्हारी परिस्थितियों में पानी कम है। अब तुम चाहते हो कि मेरी जो पहचान है कि मैं प्यासा हूँ, ये पहचान तो बनी रहे, उसी पहचान पर हमारा पूरा कामकाज, व्यवहार चलता है, वो तो बनी रहे, लेकिन साथ ही साथ माहौल ऐसा हो जाए, परिस्थितियाँ ऐसी हो जाएँ कि उनमे पानी कि भी कोई कमी न रहे। तुम ये भूल ही जाते हो कि अगर परिस्थितियाँ बदली, तो तुम भी तुम नहीं रहोगे। तुम्हारी जो पहचान है प्यासा होने की, उसे मिटना पड़ेगा। साफ़ साफ़ कहो तो “तुम्हें मरना पड़ेगा।”

