प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप आइ.आइ.टी., आइ.आइ.एम. से पढ़े, और फिर आइ.ए.एस. भी थे, फिर आपने ये सब छोड़ दिया। तो आपके भी कुछ संकोच रहे होंगे। या फिर परिस्थितियाँ कैसी थी कि आपने सबकुछ छोड़ दिया, इसकी प्रेरणा कहाँ से मिली आपको?
आचार्य प्रशांत: दूर से देखो तो ऐसा लगता है कि कहानी बिलकुल साफ़ है।
जैसे कि रास्ता बना ही हुआ था, तय ही था, और किसी को बस उसपर चलने की देर थी। ऐसा होता नहीं है। एक कदम से जब अगला कदम रखा जाता है, तो उसमें डर भी होता है, अस्पष्टता भी होती है, अनिर्णय भी होता है, सब होते हैं। लेकिन साथ-ही-साथ यह पता भी होता है कि क्या उचित है। हम इंतज़ार नहीं कर सकते कि जब तक सौ प्रतिशत स्पष्ट नहीं हो जाऊँगा, कदम नहीं बढ़ाऊँगा। हम इंतज़ार नहीं कर सकते कि – “जब तक डर बिलकुल शून्य नहीं हो जाएगा, कुछ करूँगा ही नहीं।”
डर रहेगा, कोहरा रहेगा। उसी में टटोलते-टटोलते आगे बढ़ना होता है। ऐसा नहीं है कि विपरीत या विरोधी विचार नहीं उठते, बिलकुल होगा। तुम एक ऐसी नौकरी छोड़ रहे हो जिसको पाने के लिए दुनिया बेताब रहती है, और जिसके लिए तुमने भी समय लगाया था, मेहनत करी थी, तो निश्चित-सी बात है भीतर से कुछ विरोधी विचार उठेंगे। उसके बाद फिर तुम ऐसा करियर छोड़ रहे हो जिसमें पैसा भी है, इज्ज़त भी है, फिर एक डर सिर उठाएगा कि आगे क्या है, इसको तो छोड़ रहे हो। ये सब होगा। लेकिन मज़ा तब है जब इनके होने के बावजूद भी तुम चलते रहो।
“ये हैं, पर हम इनको तवज्जो नहीं दे रहे।”
रश्मिरथी, दिनकर का काव्य ग्रन्थ है, उसमें एक जगह आती है जहाँ ‘शल्य‘ होता है कर्ण का सारथी, उसका काम ही होता है कर्ण को चिढ़ाना, परेशान करना। वो कर्ण से कहता है, “तुम्हें तो डर लग रहा है। अर्जुन सामने आया और तुम डर रहे हो”, तो कर्ण उसे बोलता है, “वो काठ के योद्धा होते हैं जिन्हें डर नहीं लगता। हाड़-माँस का जो भी योद्धा होगा, वो डरेगा ही। और उसका गौरव इसी बात में है कि डर के होते हुए भी उसने युद्ध किया।”


