प्रश्नकर्ता: सर, एकाग्रता की कमी क्या है?
आचार्य प्रशांत: बेटा, जहाँ भी एकाग्रता है न, वहाँ विकर्षण पहले ही मौजूद है। तुम किस को विकर्षण बोलती हो? जब एक वस्तु की ओर मन को केन्द्रित करना चाहती हो और मन दूसरी और दिशाओं में भाग रहा है, तो तुम क्या बोल देते हो कि ये विकर्षण है। हो कुछ नहीं रहा है, हो इतना ही रहा है कि तुम उसको एक जगह पर लगाना चाहते हो, मन का एक हिस्सा है जो चाहता है कि किसी एक जगह पर केन्द्रित हो जाए और दूसरे और कई हिस्से हैं, जिनकी अपनी दूसरी माँगें हैं, वो इधर-उधर जा रहे हैं।
एक तरफ जाने को तुमने नाम दे दिया एकाग्रता का। किताब की ओर जाओ तो तुमने नाम दे दिया एकाग्रता। और वही मन अगर खिड़की के बाहर जाना चाहता है, सड़क पर जाना चाहता है, बाज़ार में जाना चाहता है, तो तुमने उसको नाम दे दिया है विकर्षण।
एक को तुमने बहुत अच्छा घोषित कर दिया है कि एकाग्रता बड़ी अच्छी चीज़ होती है। तुम कहते हो कि, “फलाना बड़ा अच्छा विद्यार्थी है क्योंकि उसकी एकाग्रता की क्षमता बहुत अच्छी है”; दूसरे को तुमने गड़बड़ चीज़ घोषित कर दिया है। तुम कहते हो, “मन अगर इधर को गया तो ये विकर्षण है”, है न? बात इसमें एकाग्रता और विकर्षण की है, या बात तुम्हारे लेबल की है – तुमनें किसी को क्या नाम दिया है? पढ़ते समय अगर तुम्हें फिल्म का ख्याल आता है तो तुम उसे क्या बोलते हो?
प्र: विकर्षण।
आचार्य: और अगर फिल्म देखते समय पढ़ने का ख्याल आ जाए तो वो क्या है? तो वो क्या है? वो भी तो विकर्षण ही है, तो एकाग्रता और विकर्षण इन दो शब्दों को एक जानो। जो अभी एकाग्रता है थोड़ी देर में विकर्षण बन सकती है।


