युक्तेन मनसा वयं देवस्य सवितुः सवे। सुवर्गेयाय शक्त्या॥
हम सविता देवता की उपासना के निमित्त यज्ञादि कर्म मनोयोग पूर्वक संपन्न करें। इस प्रकार स्वर्गीय आनंद की प्राप्ति के लिए यथाशक्ति प्रयत्न करें।
~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय २, श्लोक २)
आचार्य प्रशांत: कर्म करने हैं यज्ञ की भाँति, किसको तृप्त करने के लिए? सविता देवता को। सविता देवता, अभी हमने पिछले श्लोक में कहा कि है मूल अहम् वृत्ति। ठीक है? मूल अहम् वृत्ति।
तुम्हें कर्म इस तरह से करने हैं कि तुम्हें अपनी मूल तृष्णा का पता चले। यह जो मूल अहम् वृति है न, यही हमारी मूल अतृप्ति है, यही हमारी मूल तृष्णा, मूल प्यास है। इसी मूल अतृप्ति और तृष्णा के कारण हमारे जीवन में हज़ारों अन्य अतृप्तियाँ रहती हैं छोटी-छोटी। कभी ये चाहिए कभी वो चाहिए, इस पल इधर जाना है दूसरे पल उधर जाना है। पचासों तरह की इच्छाएँ रहती है न, हर इच्छा एक अतृप्ति होती है।
ये जितनी इच्छाएँ हमारे भीतर रहती हैं, वो एक मूल इच्छा की वजह से रहती हैं, और वो जो मूल इच्छा है वो इन हज़ारों इच्छाओं के नीचे छुपी रह जाती है। अरे! ये तो बड़ी गड़बड़ हो गई, ये तो बड़ी गड़बड़ हो गई।
हज़ारों इच्छाएँ क्यों है? क्योंकि एक मूल इच्छा है। और हमारा पूरा जीवन किसमें व्यय हो जाता है? इन हज़ारों इच्छाओं की पूर्ति करने में। और चूँकि तुमने पूरा जीवन इन हज़ारों इच्छाओं की पूर्ति करने में लगा दिया तो मूल इच्छा अपूर्ण ही रह जाती है।

