त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरं हृदीन्द्रियाणि मनसा संनिरुध्या। ब्रह्मोडुपेन प्रतरेत विद्वान्स्त्रोतांसि सर्वाणि भयावहानि॥
विद्वान् पुरुष को चाहिए कि वह सिर, ग्रीवा और वक्षःस्थल इन तीनों को सीधा और स्थिर रखे। वह उसी दृढ़ता के साथ सम्पूर्ण इंद्रियों को मानसिक पुरुषार्थ कर अंतःकरण में सन्निविष्ट करे और ॐकार रूप नौका द्वारा सम्पूर्ण भयावह प्रवाहों से पार हो जाए।
~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय २, श्लोक ८)
आचार्य प्रशांत: श्वेताश्वतर उपनिषद् पर सांख्य और योग का प्रभाव स्पष्ट है। इस अध्याय के आज हम जितने भी श्लोक लेंगे वो बहुत सुंदर उदाहरण हैं योग और वेदान्त के समागम का। और दोनों ही तलों पर, दोनों ही आयामों में हम उन श्लोकों की व्याख्या करेंगे, उनके अर्थों को देखेंगे।
तो यह आठवाँ श्लोक हमसे कहता है कि ज्ञानी पुरुष सिर को, ग्रीवा (गर्दन) को और वक्षःस्थल (छाती) को एक सीध में करके स्थिर कर लेता है। अर्थ क्या है इसका समझते हैं। योग की दृष्टि से मन और शरीर दोनों न सिर्फ़ अन्तर्सम्बन्धित हैं, बल्कि दोनों एक दूसरे से परस्पर कार्य-कारण का संबंध भी रखते हैं। माने अगर मन पर काम करोगे तो उसका प्रभाव तन पर दिखाई देगा और तन पर काम करोगे तो उसका प्रभाव मन पर दिखाई देगा; तन स्थूल और मन सूक्ष्म।
अधिकांश व्यक्ति जिस तरह का जीवन जीते हैं उसमें सूक्ष्म के साथ उनका परिचय बड़ा क्षीण होता है। सूक्ष्म बातें जैसे हम समझते ही नहीं। इंद्रियाँ तो जो कुछ देखती हैं वो तो स्थूल ही होता है न। और अगर आप ऐसी ज़िंदगी जी रहे हैं जो इंद्रियों से ही अधिकतर संबंधित है, तो कुछ भी सूक्ष्म आपको दिखाई देना या समझ में आना बंद हो जाता है। आपको बस स्थूल पदार्थ दिखाई देता है। तो अब स्थूल तन का प्रभाव पड़ता है सूक्ष्म मन पर, और सूक्ष्म मन का प्रभाव पड़ना है स्थूल तन पर। लेकिन हम काम करें किस पर?

