प्रकाशोऽर्कस्य तोयस्य शैत्यमग्नेर्यथोष्णता। स्वभावः सच्चिदानन्दनित्यनिर्मलताऽऽत्मनः॥
जैसे सूर्य का स्वभाव प्रकाश, जल का शीतलता और अग्नि का उष्णता है, इसी तरह से आत्मा का स्वभाव सच्चिदानंद, नित्यता और निर्मलता है।
—आत्मबोध, श्लोक २४
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मेरा नमन स्वीकार करें। आत्मबोध के श्लोक संख्या २४ में लिखा है कि आत्मा का स्वभाव ही सच्चिदानंद, नित्यता और निर्मलता है और मुक्ति उसका स्वभाव है। तो फिर आत्मा क्यों शरीर में आती है और जन्म लेती है, अगर उसका स्वभाव मुक्ति ही है? कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: आधी बात तो तुमने ले ली शंकराचार्य से, बाकी आधी तुमने ख़ुद पूरी कर दी। इतना तो श्लोक कह रहा है कि आत्मा सच्चिदानंद, नित्य और निर्मल है, ये तो शंकराचार्य ने कहा। ये तुम्हें किसने बताया कि आत्मा शरीर में आती है और आत्मा जन्म लेती है? ऐसा आत्मबोध में तो कहीं नहीं लिखा।
अब ये अध्यात्म की पुरानी व्याधि है— कुछ बात लेना गुरुओं से और उसमें जोड़ देना अपनी ही पुरानी धारणा को। कुछ बात तो ले ली गुरु से और आधी बात, बाकी बात उसमें जोड़ दी अपनी।
हम ऐसे हैं कि हमें अगर अमृत-फल भी मिल जाए स्वर्ग से उतरा हुआ, तो हम उसमें अपनी रसोई का चंकी-चाट मसाला ज़रूर मिलाएँगे।


