यदृष्टाव नापरं दृश्यम् यदभूत्वा न पुनर्भव:। यज्ज्ञात्वा नापरं ज्ञेयं तदब्रह्मेत्यवधारयेत्।।
जिसके दर्शन के पश्चात् और कुछ देखने को नहीं बचता, जिसके प्राप्ति के बाद फिर संसार में जन्म नहीं होता और जिसको जानने के बाद और कुछ भी जानने को नहीं रहता, उसे ही ब्रह्म जानो।
—आत्मबोध, श्लोक ५५
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। श्लोक को पढ़कर लगता है कि जैसे ब्रह्म भी सामान्य वस्तु की तरह ही प्राप्त करने की कोई चीज़ है। ब्रह्म को देखने, जानने और प्राप्त करने से शंकराचार्य जी क्या आशय है? कृपया स्पष्ट करें।
आचार्य प्रशांत: देखना, जानना, प्राप्त करना; ब्रह्म को देखने से आशय है कि तुम्हारी आँखें अब व्यर्थ चीज़ों को इतना कम मूल्य देती हैं कि वो व्यर्थ चीज़ें दिखाई ही नहीं देतीं। तुम्हारी आँखें अब व्यर्थ चीज़ों को इतना कम मूल्य देती हैं कि वो व्यर्थ चीज़ें दिखाई देकर भी दिखाई नहीं देतीं—ये है ब्रह्म को देखना।
ऊपर कितनी बत्तियाँ हैं, किसी ने गिना क्या? (छत की ओर इशारा करके) गिन सकते थे न? आसान था गिनना, दिख तो रहा ही था, गिन सकते थे—गिना क्यों नहीं? क्योंकि व्यर्थ है गिनना, महत्व ही नहीं है गिनने का।


