वक्ता: एक आम दिमाग कैसा होता है? एक आम दिमाग कैलकुलेटिव (गणनात्मक) होता है| तो, जब भी उसे दिखाना होता है कि अब वो कैल्कुलेट (सोच-विचार) नहीं कर रहा है, वो सच्चा है, वो बना-बना के नहीं बोल रहा है, वो जोड़-तोड़ नहीं कर रहा है, तो वो इमोशनल (भावुक) हो जाता है| और हमें ये लगता है कि भावुक होने का मतलब है सच्चा होना| समझ रहे हो बात को? वो ये समझ भी नहीं पाता है कि जब कॉन्शियस (सचेत) मन में गणना होती है तो विचार आता है, और वही चीज़ जब और गहरे से उठती है और, और तगड़ा प्रभाव करती है, तो भावनाएं आ जाती हैं|
तो यहाँ तक तो हमने ठीक समझा कि विचार गणनात्मक है, विचार में बनावट रहती है| विचार कुछ-न-कुछ पाना चाहता है, हासिल करना चाहता है| कोई फायदा देखता है तभी विचार आता है| तो तुमने ये सोचा कि विचार न हो, विचार की जगह कुछ और हो जब भी, तो बात सच्ची होगी| तो तुमने विचार का विकल्प क्या बना दिया? इमोशनल (भावुक) होना| तो इसीलिए तुम देखोगे कि हमारी आदत पड़ गई है कि जैसे ही कोई रोने लग जाता है हमारे सामने तो हमें क्या लगता है?
श्रोता: सच ही कह रहा होगा|
वक्ता: की सच्चा आदमी है भाई| भावुक है तो सच्चा है| और ये बात हमें बहुत गहरे जा चुकी है ना| तुम दिन-रात टीवी में, फिल्मों में, घरों में, यही तो होता देखते हो|
श्रोता: हम भी कभी-कभी ये अनुभव करते हैं|
वक्ता: और कभी-कभी तुम भी ऐसा ही अनुभव करते हो कि अगर तुम रो पड़े, तो तुम्हें लगता है कि ये तो बड़ी गंभीर बात हो गई, और “मैं सच्चा ही हूँगा|”

