ध्यानमूलं गुरुर्मूर्ति, पूजामूलं गुरुर्पदम्। मन्त्रमूलं गुरुर्वाक्यं, मोक्षमूलं गुरूर्कृपा॥
ध्यान का मूल, गुरु की मूर्ति है। पूजा का मूल, गुरु के चरण कमल हैं। मंत्र का मूल, गुरु के शब्द हैं। मोक्ष का मूल, गुरु की कृपा है।
—(गुरुगीता, श्लोक ७६)
प्रश्नकर्ता: गुरुकृपा क्या होती है?
आचार्य प्रशांत: अगर तुम सच-सच पूछोगे, वस्तुतः पूछोगे तो गुरुकृपा कोई विशेष चीज़ होती ही नहीं, क्योंकि वो सदा है, सर्वत्र है। मनुष्य के लिए जीवन ही गुरुकृपा है; सत्य ही गुरु है और जीवन ही गुरुकृपा है।
हमने अभी कहा था न कि जीवन ही एक भेंट है, एक ऐसा तोहफ़ा जिसमें तुम आगे बढ़ सकते हो, निर्मल हो सकते हो, उन्नत हो सकते हो। तुम्हारे उन्नयन के लिए तुम्हें जो भेंट दी गई है, उसका नाम है जीवन। जीवन ही गुरुकृपा है।
लेकिन जीव तो इंद्रियों का ग़ुलाम होता है और इंद्रियों को कभी कुछ ऐसा दिखेगा ही नहीं जो सदैव और सर्वत्र हो। तुम्हारी आँखों ने कभी कुछ ऐसा देखा है जो सदा हो और हर जगह हो, कुछ देखा है? इंद्रियाँ तो उसी का अनुभव कर पाती हैं जो कभी-कभी और कहीं-कहीं हो। तो फिर जीव के लिए गुरुकृपा के विशिष्ट मायने होते हैं।


