वक्ता: इसमें लिखा है कि – “अगर मुझे पता भी है कि कोई तथ्यात्मिक रूप से गलत है तब भी मैं कुछ कह नहीं पाता। मैं ये नहीं समझा पाता कि मैं सही हूँ और वो दूसरा गलत है”।
देखो, अगर वो एक ‘तथ्य’ है, तो उसे कभी भी समझाने की ज़रूरत नहीं है। आप तथ्यों को कभी नहीं समझाते। तुम तथ्य ‘देख’ सकते हो। तथ्य देखे ही जाते हैं। तथ्य ‘बताए’ जाते हैं, तुम तथ्य बता सकते हो, पर तथ्यों पर झगड़ा नहीं कर सकते। क्या तुम तथ्यों पर झगड़ते हो?
श्रोता१: हम तथ्यों के सहारे किसी और चीज़ के लिए लड़ते हैं।
वक्ता: हाँ, तुम तथ्यों के सहारे अपने ख्याल के लिए लड़ सकते हो। तुम हमेशा अपने ख्याल के लिए लड़ते ही हो। अगर कुछ वास्तव में तथ्यात्मक है तो कोई बड़ी चीज़ निकल कर नहीं आने वाली। वो तथ्य नहीं है। वो जो पूरी खिचड़ी है न, तथ्य उसका एक हिस्सा हो सकते हैं। शायद उस खिचड़ी का हिस्सा हों, पर वो असली चीज़ नहीं हैं।
अलसी चीज़ कुछ और है। कुछ और पक रहा है। अगर वो तथ्य होते तो इतनी बहस की ज़रूरत ही क्या है। उसे गूगल या विकिपीडिया से जांचा जा सकता है। वहाँ तथ्य होते हैं या उसका अभिलेख किया जा सकता है। तथ्य वहीं मिलते हैं, और उन्हें जांचा परखा जा सकता है। तथ्यों का तो ख्याल-लब ही यही होता है कि जो मैंने देखा वही तुमने देखा। जो तुमने सुना वही उसने सुना। अदालतें तथ्यों को ही तो सत्यापित करती हैं, गवाही यही तो होती है कि ‘हाँ भई, वो दोनों कितनी दूर पर खड़े थे’। ये बताया जा सकता है ‘छ: फीट की दूरी थी’, बात ख़तम हो गई। तथ्यों में कभी इतनी बहस नहीं हो सकती। मामला कुछ और होगा। देखना पड़ेगा, मामला तथ्यों का नहीं है।

