मन हमेशा बेचैन क्यों रहता है? || आचार्य प्रशांत, छात्रों के संग (2014)

श्रोता: आचार्य जी, जब भी हमें खाली समय मिलता है, हम बातें शुरू कर देते हैं । ऐसा क्यूँ ?
आचार्य प्रशांत: मन को लगातार करने के लिए कुछ चाहिए, कुछ तो चाहिए । वो जो कुछ भी करता है उसका कोई विषय होता है; सब्जेक्ट । मन की ये वृत्ति होती है की उसको जो विषय सबसे प्यारा लग रहा है, वो उसकी ओर भागता है ।
श्रोता 2: आचार्य जी, मन से मतलब क्या होता है ? दिमाग ?
आचार्य जी: मन माने, मन । मन जानते हो ना । हाँ, दिमाग कह लो । वही जो सोच रहा है, जिसको उसने सवाल किया ना कि अन्दर कुछ चलता रहता है ।
मन वो, जिसमें अन्दर कुछ चलता रहता है ।
कुछ है ना जिसमें से आवाजें आती रहती हैं, जिसमें कभी डर उठता है, जिसमें कभी खीज उठती है, जिसमें कभी आकर्षण उठता है; कुछ है ना, उसी को मन कहते हैं ।
तो मन को कुछ चाहिए पकड़ने के लिए, किसी की ओर तो उसे जाना है । खाली वो बैठ नहीं सकता, यही प्रकृति है उसकी । मन में ऐसा भी नहीं होता की बड़ी वफादारी होती है । तुम एक विषय के साथ हो, उसे कोई दूसरा मिल गया जो उसे ज्यादा लुभा रहा है, तो वो तुरंत ही उस दूसरे की ओर चल देगा । ये देखा है ?


