प्रश्नकर्ता: मेरा सवाल ये है कि हमने पहले कई सत्रों में चर्चा की है कि इच्छा से परेशानी नहीं होती, आसक्ति से परेशानी होती है। हम इच्छा कर सकते हैं लेकिन हम दुखी इसीलिए हो जाते हैं क्योंकि हम उससे आसक्त हो जाते हैं। लेकिन यहाँ इच्छा से मुक्त होने की बात की गई है?
आचार्य प्रशांत: ये भाषा फिर से वही भाषा हो जाएगी जो बहुत व्याकुलता पैदा करती है - “हम इच्छाएँ कर सकते हैं, लेकिन उनसे आसक्त नहीं हो सकते।” आप तो कह रहे हैं कि बोध सत्र में ये बात हुई थी कि ‘इच्छा नहीं आसक्ति’। इसी बोध सत्र में मैंने कई-कई बार कहा है कि ये ‘हम’ से हट कर ‘मैं’ पर आइए, फिर उस ‘मैं’ को देखिए। इच्छा कौन करता है? ये नहीं कहा जा रहा है कि ‘हम इच्छाएँ कर सकते हैं’, क्योंकि ये तो पूरी चीज़ ही घपले वाली हो गई है। इच्छा कौन करता है? इच्छा किसको होगी?
प्र: जो ‘अहंकार’ है, वो तो है ही इच्छा।
आचार्य: अहंकार क्या है? चलिए अहंकार पर आते हैं, अहंकार क्या है?
प्र: अहंकार एक गठरी है विचारों और इच्छाओं की।
आचार्य: और गहराई से, अहंकार क्या है?
प्र: ‘मैं हूँ’ चेतना।


