अहंशब्देन विख्यात एक एव स्थित: पर:। स्थूलस्त्वनेकतां प्राप्त: कथं स्याद्देहक: पुमान्।।
“ ‘अहं’ शब्द से प्रसिद्ध परमात्मा एकमात्र स्थित है, अर्थात् वह अनेक तत्वों का संघात नहीं है। फिर जो स्थूल है और अनेक भावों को प्राप्त हो रहा है, वह देह पुरुष कैसे हो सकता है?”
~अपरोक्षानुभूति (श्लोक ३१)
आचार्य प्रशांत: अपरोक्षानुभूति से श्लोक है, श्लोक कहता है कि “‘अहं’ शब्द से प्रसिद्ध परमात्मा एकमात्र स्थित है...” जिसको ‘मैं’ शब्द से इंगित करते हो, वही है एकमात्र जो स्थित है, जिसकी हस्ती है, सत्ता है, उपस्थिति है। “...अर्थात् वह अनेक तत्वों का संघात नहीं है...” अर्थात् वह अक्षुण्ण है, अटूट है, एलिमेंटल है, उसको तोड़ा नहीं जा सकता। “...फिर जो स्थूल है और अनेक भावों को प्राप्त हो रहा है, वह देह पुरुष कैसे हो सकता है?”
प्रश्नकर्ता: ‘अहं’ शब्द यहाँ पर किस संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है, आत्मा के या अहंकार के?
आचार्य: आत्मा कभी बोलने नहीं आती कि “मैं हूँ”, अहंकार बोलने आता है कि “मैं हूँ।” और अहंकार ही बोल सकता है कि “मैं हूँ”, क्योंकि अहंकार सीमित है। समझना बात को।
(पानी का गिलास उठाते हुए) ये कहे कि “मैं हूँ”, तो इसका कहना जायज़ है, क्योंकि कहीं पर इसकी हस्ती शुरू होती है और कहीं पर ख़त्म होती है, तो ये अपनी सीमाओं के संदर्भ में दावा कर सकती है कि “मैं हूँ।” इसका ये कहना कि “मैं हूँ”, इस बात पर निर्भर करता है कि ये नहीं भी है। यहाँ पर ये है, तो फिर ये खुल कर कह पाती है कि “मैं हूँ।”


