प्रश्न: आचार्य जी, एक रिश्ता है जो सामाजिक बंधन के कारण बन गया है, विवाह का। और एक दूसरा रिश्ता है, जिसमें कोई सामाजिक बंधन नहीं है। क्या सामाजिक बंधन वाले रिश्ते को तोड़ना देना चाहिए, भले ही वो कितना ही मुश्किल हो? या उस रिश्ते को, जिसमें कोई सामाजिक बंधन नहीं, और उससे आगे बढ़ जाना चाहिए?
आचार्य प्रशांत जी: समाज की कोई बात ही नहीं है।
समाज की इसमें कोई बात ही नहीं है। चाहे सामाजिक ठप्पा लिया हो, या न लिया हो।
प्रश्नकर्ता: जब सामाजिक ठप्पा नहीं लिया होता है, तो उसे तोड़कर आगे बढ़ जाना आसान होता है, क्योंकि उसमें कोई ज़िम्मेदारी नहीं होती है।
आचार्य प्रशांत जी: जब ठप्पा लिया होता है, तो भी आगे ही बढ़ते हो, बस तरीका दूसरा निकालते हो। ख़ुफ़िया तरीका निकालते हो।
जिसको दायित्व नहीं उठाना है, वास्तविक अर्थ में, प्रेमपूर्ण अर्थ में, तो नहीं ही उठाएगा, चाहे वो शादीशुदा हो, चाहे गैर-शादीशुदा हो। शादीशुदा आदमी भी अगर विलग हो चुका है, उसके भी अगर स्वार्थ पूरे हो चुके हैं, रिश्ते से उसका मन उठ चुका है, तो वो शादीशुदा रहते हुए भी कटा-कटा रहेगा, और काटने के तरीके ढूँढ लेगा।
और जहाँ तक आध्यात्मिक मन की बात है, वो इस बात की परवाह नहीं करता कि रिश्ते पर सामाजिक ठप्पा लगा है या नहीं लगा है। वो अपनी ज़िम्मेदारी जानता है।


