विचार नहीं, प्रेम || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)

कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मानिवर्तितुम्। कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥३९॥
"तो कुल क्षय से होने वाले दोष को देख-सुन कर भी हम लोगों को इस पाप से निवृत्त होने का विचार क्यों नहीं करना चाहिए?"
~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग, श्लोक ३९
आचार्य प्रशांत: इसी आशय के तर्क आगे भी हैं। क्या कह रहे हैं? "हमें इस पाप से निवृत्त होने का विचार क्यों नहीं करना चाहिए?"
तीन तल हैं चेतना के हमारी — आत्मा शुद्धतम, फिर वृत्ति उससे ऊपर, और उससे ऊपर विचार। और विचार का ही एक टुकड़ा, एक अंश होता है तर्क। इन तीन तलों के बारे में एक बात ये है कि इनमें से कोई तल अपने से पीछे वाले तल को जीत नहीं सकता। विचार से पीछे वृत्ति होती है तो वृत्ति हमेशा विचार पर भारी पड़ेगी; विचार उठता ही वृत्ति से है। हालाँकि विचार का दावा ये होता है कि वो स्वतंत्र है, कि वो सत्यनिष्ठ है। लेकिन विचार कितना भी दावा कर ले कि वो स्वतंत्र है, सत्यनिष्ठ है, वो उठता सदा वृत्ति से ही है। और विचार में साधारणतया ये क्षमता नहीं होती कि वो पीछे मुड़ कर देख पाए कि वो कहाँ से आ रहा है। विचार आगे देख रहा होता है, किसको? विचार के आगे क्या है? संसार।
विचार संसार को देख रहा है और विचार को पता ही नहीं है कि उसके पीछे क्या बैठी हुई है जहाँ से उसका उद्गम है? वृत्ति बैठी हुई है। सिर्फ़ एक विशेष प्रकार का विचार होता है जो पीछे देख सकता है, जो आत्मगमन कर सकता है, उसको आत्मविचार कहते हैं; पर उसके लिए बड़ी सत्यनिष्ठा और ध्यान चाहिए। साधारण विचार मुड़ करके स्वयं को नहीं देख सकता, विचार के पास दर्पण जैसी कोई सुविधा नहीं होती कि वो देख पाए वो कौन है, कहाँ से आ रहा है, नहीं। विचार के पास बस आँखें होती हैं जो आगे देख रही होती हैं, दर्पण नहीं होता जो पीछे को देख पाए।





