श्रद्धा कीदृशी? गुरुवेदांत वाक्यादिषु विश्वासः श्रद्धा।
श्रद्धा कैसी होती है? गुरु और वेदान्त के वाक्यों में विश्वास रखना श्रद्धा है।
—तत्वबोध, श्लोक ५.७
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। उपरोक्त वक्तव्यों से यह साफ़-साफ़ समझ आ रहा है कि क्यों गुरु के जीवन को हमें अपने जीवन में उतारना चाहिए। गुरु के जीवन को देखकर हमें अपने जीवन में सुधार लाना चाहिए, इसी को श्रद्धा बताया गया है। परंतु बहुत सूक्ष्म रूप से कहीं एक डर बना रहता है कि कहीं पथ से हट ना जाऊँ। मन बड़ा चपल है, माया कब हावी हो जाए मन पर कुछ भरोसा नहीं। क्या श्रद्धा के लिए आत्मविश्वास भी ज़रूरी है?
आचार्य प्रशांत: श्रद्धा के लिए प्यास ज़रूरी है। अडिग बने रहने के लिए प्रेम चाहिए। आत्मविश्वास तो ख़ुद पर भरोसा हो गया, तुमने ख़ुद को ही इतना भरोसेमंद बना लिया। तुम भरोसे के इतने ही क़ाबिल होते तो फिर श्रद्धा इत्यादि की, किसी साधन की ज़रूरत ही क्या थी?
प्रेम चाहिए। आदमी स्वार्थ का पुतला है। गुरु के पास तुम्हें स्वार्थ ही लेकर आएगा, और यह अच्छी बात है। तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम कितने प्यासे हो, तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम्हारा स्वार्थ गुरु के पास सिद्ध हो रहा है और तुम्हें पता होना चाहिए कि अगर हटोगे तो प्यास फिर जलाएगी तुमको। यही चीज़ तुमको अडिग रखेगी। नहीं तो तुमने लिखा ही है, "मन बड़ा चपल है, माया कब हावी हो जाए, मन का कोई भरोसा नहीं। डर रहता है कि कहीं पथ से हट ना जाऊँ।"


