जब देखो कोई अपना, खोल दो रूह के राज़ देखो फूल तो गाओ, जैसे बुलबुल बाआवाज़ लेकिन जब देखो कोई धोखे व मक्कारी भरा लब सी लो और बना लो, अपने को बन्द घड़ा वो पानी का दुश्मन है, बोलो मत उसके आगे तोड़ देगा वो घड़े को, जाहली का पत्थर उठाके
~ संत रूमी
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कृपया इन पंक्तियों का आशय स्पष्ट करें।
आचार्य प्रशांत:
हर बात जो कही जाती है, हर उपदेश जो दिया जाता है, वो किसी ऐसे को दिया जाता है, जो उस वक़्त उसका पात्र होता है।
साधना में एक मक़ाम ऐसा आता है, जब आप ना इधर के होते हो, ना उधर के। आपके भीतर ताक़त धीरे-धीरे शक्ल ले रही होती है, जैसे कुम्हार का घड़ा पक रहा हो। अभी उसमें ज़ोर आया नहीं है, अभी वो जमा नहीं है। लेकिन आसार अच्छे हैं। इस वक़्त उसको सुरक्षा की ज़रूरत है।
एक समय ऐसा आएगा, जब तुम उसमें पानी पूरा भी भर दोगे, तो वो दरक नहीं जाएगा। एक समय ऐसा आएगा, जब तुम उसी घड़े को वाद्ययंत्र की तरह भी प्रयोग कर लोगे। और तब उसमें से संगीत बहेगा। तुम उसे मार रहे हो, तुम उसे चोट दे रहे हो, और उसमें से संगीत उठ रहा है। पर तब नहीं, जब अभी मिट्टी बैठी नहीं, जब अभी घड़ा कच्चा है।


