प्रश्न: सर, एक चीज़ मन में बैठ गयी थी। ओशो ने कहा है, बाज़ार में ही रहना है, पहाड़ों में नहीं। तो अपनेआप को सिद्ध करने की चाह थी कि अब तो बाज़ार में ही रह कर शांत रहेंगे। तो वहाँ पर अभी भी संघर्ष है, अपने को साबित करने का। कृप्या इस पर कुछ कहें।
और दूसरी ये बात, कि आपने कहा था कि ग़ुलामी छोटी सी बात पर भी सहन नहीं करनी। तो अगर मुझे कोई छोटी सी बात भी पसंद नहीं आ रही, तो क्या वो आज़ादी को ही दिखा रही है, कि मुझे आज़ादी बहुत प्यारी है?
वक्ता: दोनों सवाल बढ़िया हैं। पहली बात तो ये, कि कहा जाता है, कि बाज़ार में भी मुक्ति सम्भव है, समाधि सम्भव है। और अक्सर इस बात का अर्थ ये लिया जाता है कि बाज़ार में रहो। बात सही है, लेकिन उसका अर्थ ठीक नहीं किया गया। बाज़ार का अर्थ है, हर वो जगह जहाँ तुम हो, और कोई और है, और दोनों के मध्य कोई संबंध है। जहाँ भी तुम हो, और कोई और है, और दोनों के मध्य कोई संबंध है, हर वो जगह बाज़ार है। हर वो जगह बाज़ार है, जहाँ किसी भी प्रकार का क्रय-विक्रय चल रहा है। किसी ने कुछ दिया, किसी ने कुछ लिया। वो जगह बाज़ार हो गयी। पूरी धरती ही बाज़ार है। बाज़ार का मतलब ये थोड़े ही न होता है, जो समाज ने बाज़ार बना दिया है। कि जहाँ पर बस मुद्रा का आदान प्रदान हो रहा है, चीज़ें खरीदी बेची जा रही हैं; वही थोड़े ही बाजार है। घर बाजार नहीं है क्या? रास्ता बाज़ार नहीं है क्या? तुम मुस्कुराते हो किसी को देख कर, और वो उत्तर में मुस्कुरा देता है, लेन-देन हुआ कि नहीं हुआ? पत्नी के साथ जो रिश्ता है — ईमानदारी से बताना — लेन देन का है कि नहीं है? वो बाज़ार नहीं है? तुम्हें क्या लगता है, बाज़ार सिर्फ दुकान का नाम है? बिस्तर का नाम भी तो बाज़ार ही है। जिन पहाड़ियों पर जाते हो, और आश्रमों में गुरुओं से मिलते हो, और वहाँ रहने के पैसे देते हो, और वहाँ पहले से ही तय होता है कि चलो आये हो, तो इतनी दक्षिणा चढ़ा दो। ये सब बाज़ार नहीं है क्या?
जिसको शिक्षा कहते हो, और जिस शिक्षा के लिए लाखों खर्च करते हो, और फिर कहते हो कि ये तो मेरा कॉलेज था, ये मेरे शिक्षक थे, वहाँ बाज़ार नहीं है? वहाँ जाकर डिस्काउंट नहीं मांगते? बाज़ार कहाँ नहीं है? जहाँ कहीं भी दो लोग हैं, वहीं बाज़ार हो गया, और कई बार दो लोगों के होने की ज़रूरत भी नहीं होती। तुम जंगल भी गए हो अगर, तुमने वहाँ पर अपने लिए सुविधाजनक जगह देखी और उस जगह पर डेरा डाल दिया। ये तुमने लेन देन किया कि नहीं किया? ‘’तू मुझे सौंदर्य दिखा, मैं तुझे संगत दूंगा।‘’ आपने ज़मीन से कहा, तू मुझे सौंदर्य दिखा, मैं तुझे संगत दूंगा। जो सबसे सुन्दर जगह होगी, वहीं पर बैठ जाऊंगा। उसी को पसंद कर लूंगा। ये दुकानदारी नहीं थी? ये शॉपिंग ही तो करी है आपने, कि जो सबसे अच्छा लगा, उसी पर ऊँगली रख दी। कि ये चाहिए, वहीं पर जम गए। समझ रहे हो? तो क़तार में लगी दुकानों का ही नाम नहीं है बाज़ार। पूरी वसुंधरा बाज़ार है।

