
इन सब से मुक्ति का एक ही तरीका है, वो बचो ही नहीं जो मूर्ख जाकर के दुनिया से, जगत से, प्रकृति से कामना पूर्ति की आशा रखता था, वो बचो ही नहीं। उसके अलावा और तुम कितने भी हथकंडे लगा लो, अतीत तो लौट-लौट के बार-बार आएगा और सर पर चढ़ेगा ही चढ़ेगा।


◾ एक ही जाति होती है - वह है "बल"। बल विकसित करो अपने भीतर।
श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय: | ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति || ४, ३९ || जितेन्द्रिय, साधनापरायण और श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञान को प्राप्त होकर वह बिना विलम्ब के तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप शान्ति को प्राप्त हो जाता है। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४, श्लोक ३९प्रश्नकर्ता: आचार्य जी,…
◾ मिथ्याचारी वह है जो आगे के लालच में अच्छा काम करता है।
◾ आत्मा का विकृत सिद्धांत ही भारत की दुर्दशा…

तो शादी से पहले तो तुम ख़ुद ही सच्चाई को पर्दे में रखते हो। तुम ख़ुद ही एक दूसरे के सामने सभ्यता का, शालीनता का, भलाई का मुखौटा पहन कर बैठते हो। “नहीं, नहीं तुम बैठो! पॉपकॉर्न मैं ले आता हूँ।“
“नहीं, नहीं तुम क्यों खर्च करोगी, मैं कर रहा…

सुबह उठते ही, "जानू उठ गई? जानू टट्टी कर ली, ब्रश कर लिया? नाश्ते में क्या खा रही हो? क्यों खा रही हो? खा ही क्यों रही हो, पी क्यों नहीं रही? जानू पैरों से चल रही हो? सर के बल क्यों नहीं चल रही?"
अभी हॉट है मामला भई!…

यह जगत तो लाभ का सौदागर है। वो आप से नहीं प्रेम करता; आपसे जो मिल रहा है उसे से प्रेम करता है। और इस बात का बड़ा कड़वा अनुभव आपको तब होता है जब आप देना बंद कर देते हैं। आप तो यही सोचते रह गए कि उस व्यक्ति…

हिंदुस्तान में अभी भी दो जगह हैं जहाँ पर लडकियाँ बहुत कम पायी जाती हैं – लड़कियाँ, स्त्रियाँ सब – एक, श्मशान घाट, दूसरा, सत्संग। दोनों ही जगहों पर सच दिख जाता है न, और दोनों ही जगहों पर देह की नश्वरता दिख जाती है न। समाज नहीं चाहता है…

किसी ने आपसे पूछा, “अरे! तुमने मुझे पाँच दिन से फ़ोन नहीं किया, तुम्हें मेरी याद नहीं आयी?” आप कहते हैं, “अगर मैं इसको सच बता दूँ तो इस बेचारे के दिल को चोट लगेगी, ये दुख जाएगा।“ तो आप कहते हैं, “नहीं याद तो बहुत आयी, वो नेटवर्क नहीं…

जब शरीर का कोई हिस्सा बड़ी माँग करने लगे किसी भी तरीके से, पेट माँग करता है कि, ‘मुझे भोजन दो’, कहीं दर्द हो गया तो वो जगह माँग करती है कि, ‘मुझे आराम दो, दवा दो।‘
कामोत्तेजना चढ़ने लगी तो जननांग माँग करते हैं कि, ‘हमपर ध्यान दो’, तो…

जिस आदमी के पास स्वार्थ नहीं है वो बहुत ख़तरनाक हो जाता है, क्योंकि अब उसे मजबूर किया नहीं जा सकता; तुम उसकी जान ले सकते हो, उसे मजबूर नहीं कर सकते हो। जिसे मजबूर किया जा सकता हो, जिसे ग़ुलाम बनाया जा सकता हो; जान लो कि ऐसे ही…

जहाँ तुमको कामवासना के पूरे होने की उम्मीद हो और वहाँ वह पूरी ना हो रही हो तो फिर जो फ्रस्ट्रेशन (खींझ) और हताशा उठती है, वो बहुत-बहुत तीव्र होती है। वह इतनी तीव्र होती है कि उसकी लहर में लोग हत्या तक कर जाते हैं। जिसको एक बार यह…

दुनिया अगर ताक़त की भाषा समझती है तो ताक़त अर्जित करो। दुनिया अगर पैसे की बात सुनती है तो पैसा होना चाहिए तुम्हारे पास। हाँ, शर्त बस एक है कि तुम्हारी बात सदा सच्ची रहे। यह ना हो कि पैसा आ गया तो बात में झूठ आ गया।
जितना तुम्हारी…

मैं जितने भी कपटी लोगों से मिलता हूँ, उनकी धूर्तता की कोई सीमा नहीं। उनका दिमाग चल रहा है। वो महत्वकांक्षी हैं। वो कुछ भी कर दिखाने को तैयार हैं। उनमें ऊर्जा पूरी है, वो दुनिया पर छा जाने के लिए हौसला रख रहे हैं। उनका आत्मविश्वास देखो!
और मैं…

सही लक्ष्य की खातिर जियो। दिल में एक सही उद्वेश्य होना चाहिए। उसके बाद किसी पॉजिटिव थिंकिंग की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। ये चीज़ इतनी ज़बरदस्त मिल गई है, प्यार हो गया है इससे, अब मजबूर हैं इसके सामने। अब चाहें भी पीछे हटना तो हट नहीं सकते। जब ऐसा हो…

जो लोग दस दरवाज़ों पर खटखटा रहे होते हैं न उन बेचारों की त्रासदी यही होती है, वह ऐसे होते हैं जैसे कि कोई दस जगह गड्ढा खोदे।
यह ग्रंथों का अपमान है कि उनको एक बार पढ़ कर के किनारे रख दो। “मैंने गीता पढ़ ली!” कि, “मैंने बाइबल…

अभी मर जाओ तो तुम्हारी देह को लोग कहेंगे, “वह मिट्टी रखी है, मिट्टी।“ यह हैसियत है हमारी गंभीरता की। यह भी नहीं कहेंगे कि, “वह नवीन रखा है”, क्या कहेंगे? “मिट्टी रखी है; वह मिट्टी।“ और जब तक साँस चल रही है तब तक बड़े गंभीर हो, “अरे! दर्द-ए-दिल,…

तुम कर लो विवाह, पर यह उम्मीद मत रखना कि उससे अकेलापन कम हो जाएगा। संभोग इत्यादि के अवसर खूब उपलब्ध हो जाएँगे, वह सब हो जाएगा। बच्चे वगैरह हो जाएँगे, घर-खानदान खड़ा हो जाएगा, माता-पिता इत्यादि अगर तुमसे उम्मीदें कर रहे होंगे तो वो उम्मीदें पूरी हो जाएँगी। वह…

प्रश्नकर्ता: अपरोक्षानुभूति में बताया गया है कि मैं सब गुणों, सब क्रियाओं के पार हूँ, मैं अमर और मुक्त हूँ। तो फिर जीवन में किए गए कार्यों के लिए मैं ज़िम्मेदार कैसे हुआ?
आचार्य प्रशांत: अपरोक्षानुभूति कह रही है कि “जीव अमर है और मुक्त है, जीव अकर्ता है, जीव…

प्रश्नकर्ता: मैं कर्मयोग को समझना चाहता हूँ, कर्मयोग को जीवन में उतारना चाहता हूँ क्योंकि ज्ञान की बात आती है तब मन विचलित हो जाता है और जब भक्ति की बात आती है तब निष्क्रिय हो जाता हूँ, आलसी हो जाता हूँ, और भौतिक तल पर भी खाने के भी…

प्रश्नकर्ता: इगो (अहंकार) में और सत्य में क्या अंतर है?
आचार्य प्रशांत: जितने अंतर हैं वह सब इगो में ही हैं। अंतर कुछ कर लो, समानताएँ और अंतर यह सब मानसिक परिकल्पनाएँ हैं। आत्मा में ना कोई भेद होता है, ना अभेद होता है। तुम अगर पूछोगे कि, "अहंकार और…

प्रश्नकर्ता: शिवमय होना क्या है?
आचार्य प्रशांत: बहुत मुस्कुरा रहे हो बेटा! यही होता है शिवमय होना। पूछ रहे हैं कि “शिवमय होना क्या होता है?” यही है, सोमस्त हो जाओ। सोम जानते हो न क्या होता है, क्या होता है? ख़ुमार; सोमस्त हो जाओ, यही होता है शिवमय होना।…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपको सुनने से पहले मैं एक भजन सुनता था उसमें बोलते थे कि "सिर से तेरी बहती गंगा, काम मेरा हो जाता चंगा, नाम तेरा जब लेता।" तो भजन सुनते-सुनते मुझे लगता था कि मैं महादेव के कुछ नज़दीक हो गया हूँ और अब मेरा काम चंगा…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, हमारा मन शरीर से ज़्यादा बलशाली है। और आत्मा के विषय में गुरुजनों से सुना है कि मन से भी ज़्यादा बलशाली है। ऐसा क्यों होता है कि हम भूल-चूक करते हैं और क्या इसका मतलब यह हुआ कि भूलना जो कि मन के तल पर…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं आज शिविर में आया हूँ तो क्या यह मेरा निर्णय है या यह एक पूर्व-निर्धारित घटना है?
आचार्य प्रशांत: आप यहाँ पर आए हो ये आपके अहं का निर्णय है। आपको मुक्त होना ही है ये बात आपके निर्णय की नहीं है, यह बात तय है।…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कर्मों के बारे में कुछ कहेंगे? कर्म क्या चीज़ है?
आचार्य प्रशांत: हमारे कर्म तो सही चीज़ को पाने का ग़लत प्रयास हैं। जो गहरी नीयत है वो तो ठीक ही है कि शान्ति मिल जाए, पर जो प्रयास की पूरी दिशा है, प्रयास करने वाले का…

कर्माणि कतिविधानि सन्तीति चेत् आगामिसञ्चितप्रारब्धभेदेन त्रिविधानि सन्ति। ~तत्वबोध
कर्म कितने प्रकार के होते हैं? आगामी, संचित और प्रारब्ध - तीन प्रकार के होते हैं।
ज्ञानोत्पत्त्यनन्तरं ज्ञानिदेहकृतं पुण्यपापरूपं कर्म यदस्ति तदागामीत्यभिधीयते । ~तत्वबोध
ज्ञान की उत्पत्ति के पश्चात ज्ञानी के शरीर के द्वारा जो पाप-पुण्य रूप कर्म होते हैं, वे आगामी…

प्रश्नकर्ताः आचार्य जी, कर्म माने क्या?
आचार्य प्रशान्त: कर्म होता है और कर्म दो जगहों से निकलता है — या तो साफ केंद्र से, हृदय से, या अहंकार से। बस इतना ही। अहंकार से जो कर्म निकलेगा वह हमेशा भविष्यवाची होता है, हमेशा किसी फल, किसी मंतव्य की अपेक्षा में…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं यूट्यूब के माध्यम से जुड़ा हूँ आपसे करीब दो साल से। उसके बाद आध्यात्मिकता में थोड़ी रुचि बढ़ी। इन दो सालों में मेरे कुछ नज़दीकी मित्र थे जिनकी मृत्यु हो गई। उसके बाद मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं मर रहा हूँ। तो ये…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी आपने कहा था कि कर्म को नहीं, उसके पीछे के कर्ता को देखना चाहिए, लेकिन उसके लिए वैसी नज़र भी तो चाहिए। हम तो सिर्फ़ कर्म ही देख सकते हैं। कृपया समझाएँ।
आचार्य प्रशांत: पर अगर तुम्हारी नज़र ही यही है कि, "मुझे काम को देखना है"…

प्रश्नकर्ता: कृष्णमूर्ति साहब सभी वृत्तियों, विचारों, भावनाओं वगैरह को बिना निर्णय के देखने को कहते हैं। ये मुझे असंभव लगता है। किसी भी विचार या भावना के उठते ही मैं या तो उसके पक्ष में हो जाता हूँ या विपक्ष में। कृपया समझाएँ।
आचार्य प्रशांत: विचार जिसको उठ रहा है…

प्रश्नकर्ता: गीता में श्रीकृष्ण तीन तरीके के काम का ज़िक्र करते हैं: सकाम कर्म, कर्म, अकर्म और विकर्म। तो इनमें क्या भेद है?
आचार्य प्रशांत: कर्म, अकर्म, विकर्म, सकाम कर्म, निष्काम कर्म। चलो समझते हैं। संसार माने गति। प्रकृति माने परिवर्तन, समय माने परिवर्तन। ये पाँच तरह के कर्म क्या…

आचार्य प्रशांत: “कर्ता कौन है? जीव कौन है?” उपनिषद् ने यहाँ भी बड़े संक्षेप में उत्तर दिए हैं। कर्ता वो है जिसे सुख और दु:ख की अभीप्सा है। जिसे सुख और दु:ख की अभीप्सा है उसका नाम कर्ता है; क्योंकि वो जो कुछ भी करता है किस लिए करता है?…

प्रश्नकर्ता: ओशो जी से ये बात सुनी है है कि कर्मफल कर्म के बिलकुल साथ में आता है। कृपया इसे समझाने की कृपा करें।
आचार्य प्रशांत: झूठ कोई ऐसे ही तो बोलता नहीं न। हिंसा कोई यूँ ही तो करता नहीं। जितने भी कृत्य होते हैं जिनको तुम पाप कहते…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम स्वयं को कर्ता मानें या नहीं?
आचार्य प्रशांत: कर्ता तुम हो, लगातार हो, तुम्हीं हो, कोई और नहीं है। आम आदमी जिस स्थिति पर बैठा है उसके लिए बहुत ज़रूरी है कि वो लगातार खुद को ही कर्ता माने। आम आदमी के लिए बोल रहा हूँ,…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। ये पूछना था कि मैंने कई बार देखा है कि बचपन में ही छोटे बच्चे बहुत ही गंभीर हालत में बीमारियों में आ जाते हैं अस्पतालों में, कैंसर हो जाता है, बहुत सी अलग-अलग बीमारियाँ हो जाती हैं। सबका कारण यही दिया जाता है कि ये…

प्रश्नकर्ता: सर नमस्ते, मुझे ये समझने में बड़ी समस्या होती है कि किस पर भरोसा करूँ और किस पर न करूँ।
आचार्य प्रशांत: किसी पर भी भरोसा करने का निर्णय तुम ही करोगे न? और भरोसा नहीं करने का भी निर्णय तुम ही करोगे। तो अंततः तुमने भरोसा किस पर…

प्रश्नकर्ता: आखिरी सवाल है। वह यीशु मसीह के शूली चढ़ने को लेकर, उस विषय पर है। सवाल बिलकुल वह नहीं है पर वो जिस परिवेश में है, उस परिवेश के बारे में मैं आपसे जानना चाहूँगा। ईसाईयों में, या जो लोग यीशु मसीह को या ईसाई धर्म को भी मानते…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब हम ये बात करते हैं कि बेड़ियाँ काटनी हैं या पुराने ढर्रों से बाहर निकलना है। तो जैसा कि आपने गीता के सत्र में कहा था कि जब कृष्ण कहते हैं कि, "या तो मेरी सुन ले या मेरी माया की सुन ले।" तो हमें ऐसा…

आचार्य प्रशांत (आचार्य): तुलसीदास उल्लेख करते हैं एक स्थान पर, वहीं से प्रश्नकर्ता ने ये सवाल रखा है: उल्लेख ये है कि ब्रह्मा जी पार्वती जी से शिकायत कर रहे हैं कि शिव आगा-पीछा देखे बिना, विचारे बिना, दान करते रहते हैं। इतना दान दे देते हैं कि उनके पास…

प्रश्नकर्ता (प्र): शिव और शंकर में क्या अंतर है?
आचार्य प्रशांत (आचार्य): आम जनमानस में, आम मन में तो ये एक ही हैं—शिव बोलो कि शंकर बोलो कि भोलेनाथ बोलो कि कैलाशपति बोलो। सहस्त्रों नाम हैं। इनको आप एक ही कह देते हैं। पर अध्यात्म की दुनिया में बाकी सारे…

अचार्य प्रशांत: वास्तव में जब शिव और शक्ति का निरूपण किया जाता है चित्रों में तो बड़े भ्रामक तरीके से किया जाता है। यूँ दिखा दिया जाता है—आपने अर्धनारीश्वर की मुद्राएँ देखी होंगी कि आधे शिव हैं और आधी शक्ति। यह बात बचकानी है। शक्ति ही शक्ति हैं, शिव कहीं…

प्रश्नकर्ता (प्र): शिव जी की तीन आंखों की परिभाषा सूर्य, चंद्रमा, अग्नि है। इनका क्या अर्थ है?
आचार्य प्रशांत (आचार्य): सूरज और चंद्रमा, दिन और रात के प्रतीक हैं। दिन और रात मतलब द्वैत के दो सिरे। दिन व रात मतलब वो सब कुछ जो हमें खंडित प्रतीत होता है।…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब सत्य/चेतना चुनाव करते हैं तो विवेक क्या है? चेतना और सत्य क्या भिन्न हैं? जब हम अध्यात्म की पहली सीढ़ी चढ़ते हैं, तो क्या विवेक ही नहीं है जो बढ़ता है? कृपया समझाएं?
आचार्य प्रशांत: हमारी चेतना, अशुद्ध चेतना होती है। उसका लक्ष्य होता है- सत्य।…

प्रश्नकर्ता: क्या खोज रहे हैं हम?
आचार्य प्रशांत: यह जितना कुछ हम देखते हैं, यह जो कुछ भी हम अनुभव करते हैं, सुनते हैं, इसका अनुभव हमें यूँ ही नहीं हो रहा। थोड़ा गौर करेंगें तो आपको भी दिखेगा। कुछ भी आपको व्यर्थ ही नहीं दिख रहा, अकारण ही नहीं…

आचार्य प्रशांत: यदि प्राणी हृदय से संचालित है तो वो वास्तव में परम स्रोत से ही संचालित है; पर ये शर्त बड़ी है कि उसे हृदय से संचालित होना चाहिए। जब वह हृदय से संचालित होता है तो इन्द्रियाँ वैसी हो जाती हैं जैसी श्रीकृष्ण भगवद्गीता में कहते हैं, कि,…

प्रश्नकर्ता: वेदान्त क्यों रचा गया?
आचार्य प्रशांत: ऋषियों का एक-एक शब्द सुनने वाले बेचैन मन की शान्ति हेतु ही है। यही एकमात्र उद्देश्य है उपनिषदों का। एक-एक बात जो कही जा रही है वह किसी अवस्था विशेष से कही जा रही है; सत्य, अनावलंबित सत्य, निरुद्देश्य सत्य, निष्प्रयोजन सत्य, कहा…

आचार्य प्रशांत: पूरे अस्तित्व की जहाँ से शुरुआत होती है। इस दुनिया में ही जो बिल्कुल प्रथम बिंदु है, ये याद रखना है कि उनसे भी श्रेष्ठ कोई है। तो पहले तो मन को ऊँचा-ऊँचा-ऊँचा, और ऊँचा, और ऊँचा उठाओ, अधिकतम और उच्चतम, जहाँ तक मन को ले जा सकते…

आचार्य प्रशांत: मन में सब कुछ विनाशी है पर कामना बहुत है मन को अविनाशी की। मन अज्ञान से भरा हुआ है, उसी को अंधकार कहते हैं पर कामना बहुत रहती है हमको ज्ञान की, प्रकाश की। देखा है कितने सवाल पूछते हैं हम? देखा है छोटा बच्चा भी इधर-उधर…

प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। शरीर, मन, बुद्धि, दृश्य व अदृश्य जगत का आधार ब्रह्म हैं और वह ब्रह्म सर्वत्र है, सर्वव्यापी है, विश्वरूप है। उसकी रचना वस्तु में भी ब्रह्म है, तो फिर यह अज्ञान क्यों? क्या हम वह नहीं है या अगला ब्रह्म नहीं है?
दूसरा प्रश्न है, "कुछ…

आचार्य प्रशांत: सत्य को मायापति कहा गया है; समझते हैं। माया क्या? वो जो हमें प्रतीत होता है, जिसकी हस्ती के बारे में हमें पूरा विश्वास हो जाता है, पर कुछ ही देर बाद या किसी और जगह पर, किसी और स्थिति में हम पाते हैं कि वो जो बड़ा…